काल भैरव मूठ एवं तंत्र काट साधना शाबर मंत्र
काल भैरव का जो नाम ले नर नारी उसके लिए मूठ कभी ना पड़े भारी जय जय काल भैरव देव मूठ चली हवा बनकर काल भैरव चले ढाल बनकर अष्ट हाथ भैरव जी के फैले काट दी जड़ मूठ की चढ़ा दी आकाश नीचे काटी ऊपर काटी काट दी पाताल में 11
अघोर और वाम-मार्ग विद्या में 'मूठ' मारण का सबसे घातक स्वरूप है, जिसे हवा के माध्यम से सीधे लक्ष्य के प्राण हरने के लिए निर्देशित किया जाता है। इस मंत्र का विशुद्ध प्रयोजन उस 'हवा बनकर आती हुई' मारण मू
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यह मंत्र क्यों?
अघोर और वाम-मार्ग विद्या में 'मूठ' मारण का सबसे घातक स्वरूप है, जिसे हवा के माध्यम से सीधे लक्ष्य के प्राण हरने के लिए निर्देशित किया जाता है। इस मंत्र का विशुद्ध प्रयोजन उस 'हवा बनकर आती हुई' मारण मूठ को काल भैरव की अतीन्द्रिय ढाल के माध्यम से टकरा कर शून्य में विलीन करना है 11। मंत्र की विशिष्ट ध्वनि-संरचना से काल भैरव जी के सूक्ष्म 'अष्ट-भुजाओं' (आठ हाथों) का विस्तार होता है, जो पाताल से लेकर आकाश तक किसी भी दिशा से आ रहे तांत्रिक हमले की जड़ को काट देते हैं। इसके प्रभाव से पीड़ित नर-नारी के प्राणों की तत्काल रक्षा होती है और मूठ का मारक प्रभाव उनके जीवन पर कभी भारी नहीं पड़ता 11।
इस मंत्र से क्या होगा?
अघोर और वाम-मार्ग विद्या में 'मूठ' मारण का सबसे घातक स्वरूप है, जिसे हवा के माध्यम से सीधे लक्ष्य के प्राण हरने के लिए निर्देशित किया जाता है
इस मंत्र का विशुद्ध प्रयोजन उस 'हवा बनकर आती हुई' मारण मूठ को काल भैरव की अतीन्द्रिय ढाल के माध्यम से टकरा कर शून्य में विलीन करना है 11
मंत्र की विशिष्ट ध्वनि-संरचना से काल भैरव जी के सूक्ष्म 'अष्ट-भुजाओं' (आठ हाथों) का विस्तार होता है, जो पाताल से लेकर आकाश तक किसी भी दिशा से आ रहे तांत्रिक हमले की जड़ को काट देते हैं
इसके प्रभाव से पीड़ित नर-नारी के प्राणों की तत्काल रक्षा होती है और मूठ का मारक प्रभाव उनके जीवन पर कभी भारी नहीं पड़ता
जाप विधि
यह अघोर और शाबर तंत्र का एक अचूक 'तंत्र-काट' मंत्र है जिसका उपयोग विशेष रूप से तब किया जाता है जब किसी व्यक्ति पर प्राणघातक 'मूठ' (काले जादू का सर्वाधिक उग्र रूप, जिसे हवा में मंत्रित सामग्री के रूप में भेजा जाता है) छोड़ी गई हो 11। इसकी प्राथमिक सिद्धि के लिए साधक को भैरव जी के जाग्रत मंदिर में या श्मशान की बाह्य सीमा पर बैठकर लगातार 21 या 41 दिनों तक इसका रात्रिकालीन जप कर ऊर्जा संचित करनी होती है। किसी पीड़ित व्यक्ति पर हुए प्राणघातक तांत्रिक प्रहार को काटने के लिए साधक अपने हाथ में शुद्ध जल, श्मशान/हवन की भस्म या पीली राई (सरसों) लेकर इस मंत्र का 21 बार उच्च स्वर में उच्चारण करता है। अभिमंत्रित होने के पश्चात उस सामग्री को दसों दिशाओं (आकाश, पाताल, ऊपर, नीचे और चारों ओर) में पूरी शक्ति से फेंका जाता है, जिससे भैरव जी की ऊर्जा एक अदृश्य और अभेद्य ढाल (Energetic Shield) का निर्माण करती है 11।
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