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उद्देश्य अनुसार मंत्र
कामाख्या माई (सर्वकाम मनोवांछित फल सिद्धि)

कामाख्या माई (सर्वकाम मनोवांछित फल सिद्धि) शाबर मंत्र

क्रिम कामाख्या माई निज भैरव के संग आई देवे मनोवांछित सिद्धि पूरे सब कामना लेवे अडहुल का फूल सब स्त्री तोरा रूप मनसा पूरो माई तो शंकर की दुहाई क्रिंग क्रिंग क्रीम 18

इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन साधक के जीवन में मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति और अत्यंत क्लिष्ट मनोकामनाओं की पूर्णता है 18। 'अडहुल का फूल' (गुड़हल) कामाख्या माता को अत्यंत प्रिय है, और 'सब स्त्री तोर

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशाबर मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन साधक के जीवन में मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति और अत्यंत क्लिष्ट मनोकामनाओं की पूर्णता है 18। 'अडहुल का फूल' (गुड़हल) कामाख्या माता को अत्यंत प्रिय है, और 'सब स्त्री तोरा रूप' पंक्ति के माध्यम से साधक संपूर्ण स्त्री-जाति में देवी के दर्शन कर अपनी आध्यात्मिक चेतना को सर्वोच्च स्तर पर ले जाता है। इसके निरंतर 90 दिवसीय अभ्यास से साधक को कामाख्या माई की असीम कृपा और भैरव का संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे तंत्र साधनाओं में श्रेष्ठतम प्रगति होती है और सांसारिक जीवन की जटिल समस्याओं का स्वतः समाधान होने लगता है 18। यह मंत्र ब्रह्मांडीय मातृ-ऊर्जा को आकृष्ट कर जीवन को पूर्णता और लौकिक सफलता की ओर ले जाता है।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन साधक के जीवन में मनोवांछित सिद्धियों की प्राप्ति और अत्यंत क्लिष्ट मनोकामनाओं की पूर्णता है 18

02

'अडहुल का फूल' (गुड़हल) कामाख्या माता को अत्यंत प्रिय है, और 'सब स्त्री तोरा रूप' पंक्ति के माध्यम से साधक संपूर्ण स्त्री-जाति में देवी के दर्शन कर अपनी आध्यात्मिक चेतना को सर्वोच्च स्तर पर ले जाता है

03

इसके निरंतर 90 दिवसीय अभ्यास से साधक को कामाख्या माई की असीम कृपा और भैरव का संरक्षण प्राप्त होता है, जिससे तंत्र साधनाओं में श्रेष्ठतम प्रगति होती है और सांसारिक जीवन की जटिल समस्याओं का स्वतः समाधान होने लगता है 18

04

यह मंत्र ब्रह्मांडीय मातृ-ऊर्जा को आकृष्ट कर जीवन को पूर्णता और लौकिक सफलता की ओर ले जाता है

जाप विधि

यद्यपि कामाख्या साधनाएं बहुधा वाम-मार्गी (वामाचारी) पद्धति से बलि और तामसिक भोग के साथ की जाती हैं, परंतु यह विशिष्ट शाबर मंत्र दक्षिण-मार्गी (सात्विक) पद्धति के लिए पूर्णतः अनुकूल है, जिसमें किसी प्रकार की बलि या रक्त का विधान आवश्यक नहीं है 18। साधक को देवी की सात्विक पूजन पद्धति संपन्न करने के उपरांत रुद्राक्ष की शुद्ध माला से इस मंत्र का 11 माला जप करना होता है। तदुपरांत, यह अनुष्ठान एक 90 दिनों की दीर्घकालिक साधना में परिवर्तित हो जाता है, जहाँ साधक नित्य इस मंत्र का 1 माला जप अनिवार्य रूप से करता है 18। यदि पुरुष साधक है, तो वह 90 दिनों तक इसे निर्विघ्न रूप से जारी रखेगा; किंतु महिला साधकों को अशुद्धि (मासिक धर्म) के 4-5 दिनों में इस जप को विश्राम देना होता है (यद्यपि वामाचारी पद्धति में यह वर्जित नहीं होता, पर दक्षिण मार्ग में भौतिक पवित्रता अनिवार्य है) 18।

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