राजा रामचन्द्र एवं गोरखनाथ (बंगाली नाथ रक्षा बाण) शाबर मंत्र
राम कुण्डली, ब्रह्मचाक । तेतीस कोटि देवा देवा अमुक की बेड़ियां । अमुकेर अंकेर बाण काटम्। शर काटम् । संधान काटम् । कुज्ञान काटम् । कारवणे काटे । राजा रामचन्द्रेर आज्ञा । राजा रामचन्द्ररे ऐई झण्डी अमुकेर अंगे शीघ्र लागूगे 25
इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन दूर-स्थानीय (Telepathic/Tantric) अस्त्रों और मारण प्रहारों से साधक के प्राणों और शरीर (अंगे) की रक्षा करना है 25। यह मंत्र शत्रु द्वारा भेजे गए 'बाण' (तांत्रिक तीर), 'शर'
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन दूर-स्थानीय (Telepathic/Tantric) अस्त्रों और मारण प्रहारों से साधक के प्राणों और शरीर (अंगे) की रक्षा करना है 25। यह मंत्र शत्रु द्वारा भेजे गए 'बाण' (तांत्रिक तीर), 'शर' (अदृश्य मारक प्रहार), 'संधान' (लक्ष्य बेधने की क्रिया), और 'कुज्ञान' (काले जादू की विद्या) को हवा में ही काटकर नष्ट कर देता है 25। राजा रामचंद्र की सर्वोच्च आज्ञा से यह तेतीस कोटि देवताओं की ऊर्जा को जाग्रत कर एक ऐसा 'ब्रह्मचाक' (ब्रह्मांडीय चक्र या पहिया) निर्मित करता है जिसे भेद पाना किसी भी तामसिक शक्ति, अघोरी या तांत्रिक के लिए पूर्णतः असंभव है 25।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र का केंद्रीय प्रयोजन दूर-स्थानीय (Telepathic/Tantric) अस्त्रों और मारण प्रहारों से साधक के प्राणों और शरीर (अंगे) की रक्षा करना है 25
यह मंत्र शत्रु द्वारा भेजे गए 'बाण' (तांत्रिक तीर), 'शर' (अदृश्य मारक प्रहार), 'संधान' (लक्ष्य बेधने की क्रिया), और 'कुज्ञान' (काले जादू की विद्या) को हवा में ही काटकर नष्ट कर देता है 25
राजा रामचंद्र की सर्वोच्च आज्ञा से यह तेतीस कोटि देवताओं की ऊर्जा को जाग्रत कर एक ऐसा 'ब्रह्मचाक' (ब्रह्मांडीय चक्र या पहिया) निर्मित करता है जिसे भेद पाना किसी भी तामसिक शक्ति, अघोरी या तांत्रिक के लिए पूर्णतः असंभव है
जाप विधि
यह बंगाली तांत्रिक परंपरा और नाथ संप्रदाय के सम्मिश्रण से उत्पन्न एक अत्यंत सिद्ध शाबर रक्षा-मंत्र है, जो विशेष रूप से काले जादू के प्रहार के समय प्रयुक्त होता है 25। जब साधक को किसी अत्यंत उग्र तांत्रिक प्रहार की अनुभूति या आशंका हो, तब वह इस मंत्र का तेज स्वर में उच्चारण करते हुए अपने चारों तरफ किसी लोहे की कील, चाकू या सिद्ध भस्म से एक 'रेखा' (सुरक्षा घेरा / राम कुण्डली) खींचता है 25। मंत्र में जहाँ 'अमुक' और 'अमुकेर' शब्द आए हैं, वहाँ साधक को अपना नाम या उस पीड़ित व्यक्ति का नाम लेना होता है जिसकी रक्षा की जा रही हो। इस प्रक्रिया को 3 या 7 बार दोहराते हुए घेरा पूर्ण किया जाता है, जिससे वह स्थान भौतिक और अतीन्द्रिय दोनों रूपों में अभेद्य बन जाता है 25।
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श्रीम क्लीम सरस्वती बुद्ध जन्य स्वाहा सततम मंत्र राजोयम दक्षिणे मां सदावतु ऐम ह्रीम श्रीम क्लीम त्र्यक्षरो मंत्रो नैऋत्यम सर्वदावतु ओम ऐकवासिन्य स्वाहा मां वारुणेवतु ओम सर्वांबिकाय स्वाहा वायव्यमा सदावतु ओम ऐम श्रीम क्लीम गद्यवासिन्य स्वाहा माम उत्तरेवतु ऐम सर्वशास्त्र वासिन्ये स्वाहान्य सदा ओम ह्रीम सर्व पूजिता स्वाहा चोरध्वं सदावतु ओम ह्रीम पुस्तक वासिन्य स्वाहा धोमांम सदावतु ओम ग्रंथ बीज स्वरूपाय स्वाहा मां सर्वतो वतु इति कथित विप्र ब्राह्म मंत्र विग्रहम इदम विश्व जयं नाम कवचम ब्रह्म रूपकम पंचलक्ष जपे नैव सिद्धमु कवचम भवे यदि सिद्ध कवचो बृहस्पति समो भवे महा वाग्मी कविंद्र त्रैलोक्य विजयी भवेत 27
ugra mantraउच्छिष्ट चांडालिनी सुमुखी देवी महापिशाचिनी ह्रीं ठः ठः ठः
tantrik mantraक ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं
siddh mantraत्वमस्मिन् कार्य निर्योगे प्रमाणं हरि सत्तम । हनुमान यत्नमास्थाय दुःख क्षय करो भव ॥
jap mantraॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
naam mantraकेदारनाथ