भगवान श्री कृष्ण (श्रीनाथजी) भक्ति मंत्र
श्री कृष्णः शरणं मम
भगवान श्री कृष्ण को अपने एकमात्र आश्रय और शरणस्थल के रूप में स्वीकार कर, दैहिक, दैविक और भौतिक (त्रिविध) तापों का पूर्ण शमन करना 30। यह नाम-जप अज्ञानवश (जैसे चलते समय जीवों की हत्या) होने वाले पापों स
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
भगवान श्री कृष्ण को अपने एकमात्र आश्रय और शरणस्थल के रूप में स्वीकार कर, दैहिक, दैविक और भौतिक (त्रिविध) तापों का पूर्ण शमन करना 30। यह नाम-जप अज्ञानवश (जैसे चलते समय जीवों की हत्या) होने वाले पापों से बचाता है और श्री कृष्ण की शुद्ध रस-मयी अलौकिक सेवा-भक्ति के योग्य बनाता है 29।
इस मंत्र से क्या होगा?
भगवान श्री कृष्ण को अपने एकमात्र आश्रय और शरणस्थल के रूप में स्वीकार कर, दैहिक, दैविक और भौतिक (त्रिविध) तापों का पूर्ण शमन करना 30
यह नाम-जप अज्ञानवश (जैसे चलते समय जीवों की हत्या) होने वाले पापों से बचाता है और श्री कृष्ण की शुद्ध रस-मयी अलौकिक सेवा-भक्ति के योग्य बनाता है
जाप विधि
पुष्टिमार्ग परंपरा में इस अष्टाक्षर मंत्र का जप प्रत्येक क्षण, उठते-बैठते और कार्य करते हुए मानसिक रूप से निरंतर किया जाना चाहिए 28। सेव्य स्वरूप (श्रीनाथजी) के सम्मुख बैठकर या उन्हें हृदय में विराजमान अनुभव करते हुए, बिना किसी लौकिक कामना के केवल समर्पण भाव से इसका स्मरण करें 28। वल्लभ संप्रदाय में इसे 'ब्रह्म संबंध' दीक्षा के समय गुरु द्वारा हाथ में तुलसी दल रखकर प्रदान किया जाता है 30। इसे सकाम अनुष्ठान के रूप में जपने के बजाय, ईश्वर के अनुग्रह को स्वीकार करने के भाव से जपा जाना चाहिए 28।
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