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उद्देश्य अनुसार मंत्र
भगवान विष्णु (नारायण कवच)

भगवान विष्णु (नारायण कवच) कवच मंत्र

यया...source विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ।।1।। भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्। यथाऽऽततायिनः शत्रून्...source वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ।।3।। धौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः। कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।4।। नारायणमयं वर्म संनह्येद्भय आगते। पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि ।।5।। मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्। ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा: ।।6।। करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया। प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु ।।7।। न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि। षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ।।8।। वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु। मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः ।।9।। सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्। ॐ विष्णवे नम इति ।।10।। आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्। विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।11।। ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे। दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ।।12।। जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्। स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥13॥ दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः। विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥14॥ रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः। रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥15॥ मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्। दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥16॥ सनत्कुमारोऽवतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्। देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥17॥ धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्याद्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा। यज्ञश्च लोकादवताञ्जनान्ताद् बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ॥18॥ द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात्। कल्किः कले कालमलात्प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ॥19॥ मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः। नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥20॥ 1

नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा, आंतरिक सामर्थ्य व आत्मविश्वास में वृद्धि, विघ्नों-बुराइयों और दुखों का शमन, मन की दुर्भावनाओं एवं नकारात्मकताओं का नाश तथा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि एवं मा

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारकवच मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा, आंतरिक सामर्थ्य व आत्मविश्वास में वृद्धि, विघ्नों-बुराइयों और दुखों का शमन, मन की दुर्भावनाओं एवं नकारात्मकताओं का नाश तथा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि एवं मानसिक शांति की प्राप्ति 1।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं से पूर्ण सुरक्षा, आंतरिक सामर्थ्य व आत्मविश्वास में वृद्धि, विघ्नों-बुराइयों और दुखों का शमन, मन की दुर्भावनाओं एवं नकारात्मकताओं का नाश तथा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि एवं मानसिक शांति की प्राप्ति

जाप विधि

स्नान अथवा आचमन कर शारीरिक रूप से शुद्ध हों। आरामदायक एवं साफ वस्त्र पहनकर एकांत तथा स्वच्छ स्थान का चयन करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और कुश की पवित्री धारण करें। "ॐ नमो नारायणाय" (अष्टाक्षर मंत्र) और "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" (द्वादशाक्षर मंत्र) के माध्यम से अंगों में न्यास करें। भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए प्रार्थना और संकल्प के साथ इस स्तोत्र का पाठ करें 1।

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