भगवान शनि (शनि वज्रपञ्जर कवच) कवच मंत्र
नासां वैवस्वत: पातु मुखं मे भास्कर: सदा । नाभिं गृहपति: पातु मन्द: पातु कटिं तथा । पदौ मन्दगति: पातु सर्वांग पातु पिप्पल: । आंगो पांगानी सर्वानी रक्षे में सूर्य नंदन इत्तेत कवच देव पठे सूर्य सुतस्य यह नतस्य जायते पीडा प्रीतो भवति सूर्य जह व्यय जन्म द्वितीय मृत्यु स्थान गतो पिवा कलस्थो गतो वापी सुप्रीतु सदाशनी अष्टमस्थे सूर्यसुते व्यये जन्म द्वितीयगे। कवचं पठते नित्यं न पीडा जायते क्वचित्। इत्य तत कवचम दिव्यम सौरे निर्मित पुरा जन्म लग्न स्थिता दोषा सर्वान नाश्यते प्रभु इति शनि कवच संपूर्णं ॥ 20
जन्म-लग्न के सभी क्रूर दोषों की समाप्ति, अष्टम, द्वितीय अथवा व्यय भाव में स्थित शनि के क्रूर प्रभावों का शमन, शारीरिक अंगों की रक्षा और पीड़ा का निवारण 20।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
जन्म-लग्न के सभी क्रूर दोषों की समाप्ति, अष्टम, द्वितीय अथवा व्यय भाव में स्थित शनि के क्रूर प्रभावों का शमन, शारीरिक अंगों की रक्षा और पीड़ा का निवारण 20।
इस मंत्र से क्या होगा?
जन्म-लग्न के सभी क्रूर दोषों की समाप्ति, अष्टम, द्वितीय अथवा व्यय भाव में स्थित शनि के क्रूर प्रभावों का शमन, शारीरिक अंगों की रक्षा और पीड़ा का निवारण
जाप विधि
शनि की महादशा, साढ़ेसाती, ढैय्या अथवा अन्य पीड़ाओं के समय भगवान शनिदेव का स्मरण करते हुए नित्य श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करें 20।
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