अष्टांग योग समापन शांति मंत्र (स्वस्ति मंत्र) शांति मंत्र
ॐ स्वस्ति प्रजाभ्यः परिपालयन्तां न्यायेन मार्गेण महीं महीशाः । गोब्राह्मणेभ्यः शुभमस्तु नित्यं लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति मंत्र का मुख्य प्रयोजन योगाभ्यास के दौरान शरीर और नाड़ी तंत्र में उत्पन्न हुई प्रचंड ऊर्जा (Pranic energy) को शांत, संतुलित और सील (seal) करना है 31। यदि योग के बाद इस ऊर्जा को शांत न किया जा
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति मंत्र का मुख्य प्रयोजन योगाभ्यास के दौरान शरीर और नाड़ी तंत्र में उत्पन्न हुई प्रचंड ऊर्जा (Pranic energy) को शांत, संतुलित और सील (seal) करना है 31। यदि योग के बाद इस ऊर्जा को शांत न किया जाए, तो मन में चंचलता या शारीरिक उत्तेजना बनी रह सकती है। यह मंत्र साधक की व्यक्तिगत ऊर्जा को विश्व-शांति, शासकों की न्यायप्रियता, और प्रकृति (गौ) एवं ज्ञानियों (ब्राह्मण) के संरक्षण की वृहद भावना के साथ जोड़ता है 15। इससे मानसिक दृढ़ता प्राप्त होती है, शारीरिक थकान और स्नायविक तनाव (nervous tension) दूर होता है, और मन-मस्तिष्क में एक असीम, सर्वव्यापी शांति की स्थापना होती है जो साधक को दिन भर के कार्यों के लिए स्थिर और एकाग्र बनाए रखती है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति मंत्र का मुख्य प्रयोजन योगाभ्यास के दौरान शरीर और नाड़ी तंत्र में उत्पन्न हुई प्रचंड ऊर्जा (Pranic energy) को शांत, संतुलित और सील (seal) करना है 31
यदि योग के बाद इस ऊर्जा को शांत न किया जाए, तो मन में चंचलता या शारीरिक उत्तेजना बनी रह सकती है
यह मंत्र साधक की व्यक्तिगत ऊर्जा को विश्व-शांति, शासकों की न्यायप्रियता, और प्रकृति (गौ) एवं ज्ञानियों (ब्राह्मण) के संरक्षण की वृहद भावना के साथ जोड़ता है 15
इससे मानसिक दृढ़ता प्राप्त होती है, शारीरिक थकान और स्नायविक तनाव (nervous tension) दूर होता है, और मन-मस्तिष्क में एक असीम, सर्वव्यापी शांति की स्थापना होती है जो साधक को दिन भर के कार्यों के लिए स्थिर और एकाग्र बनाए रखती है
जाप विधि
यह शांति मंत्र विशेष रूप से अष्टांग योग (मैसूर शैली) या किसी भी गहन योगाभ्यास (आसन और प्राणायाम) के समापन पर जपा जाता है 15। शारीरिक अभ्यास के पश्चात शवासन या पद्मासन में बैठकर, श्वास की गति को पूर्णतः सामान्य और शांत करते हुए इसका उच्चारण किया जाता है 32। हाथों को अंजलि मुद्रा में वक्षस्थल के मध्य रखकर, शरीर में उत्पन्न हुई योगिक ऊर्जा (प्राण) को एकाग्र करते हुए इस मंत्र का धीमा और गुंजायमान जप किया जाना चाहिए। इसे अभ्यास के अंत में सामान्यतः १ से ३ बार जपने का विधान है, जिसके पश्चात 'शांति' शब्द के तीन बार उच्चारण के साथ शरीर के तीनों स्तरों (स्थूल, सूक्ष्म, कारण) में शिथिलता का अनुभव किया जाता है 15।
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