ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
मूल त्रिविध शांति मंत्र (सर्व उपनिषद एवं योग परंपरा)

मूल त्रिविध शांति मंत्र (सर्व उपनिषद एवं योग परंपरा) शांति मंत्र

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

इस त्रिविध शांति मंत्र का प्रत्यक्ष और अचूक प्रयोजन दैहिक (शारीरिक और मानसिक रोग/विकार), दैविक (प्राकृतिक या ब्रह्मांडीय आपदाएं और अदृश्य शक्तियां), और भौतिक (मनुष्यों, जंतुओं या बाह्य परिस्थितियों से

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशांति मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस त्रिविध शांति मंत्र का प्रत्यक्ष और अचूक प्रयोजन दैहिक (शारीरिक और मानसिक रोग/विकार), दैविक (प्राकृतिक या ब्रह्मांडीय आपदाएं और अदृश्य शक्तियां), और भौतिक (मनुष्यों, जंतुओं या बाह्य परिस्थितियों से उत्पन्न संघर्ष)—इन तीनों प्रकार के तापों और बाधाओं को तुरंत शांत करना है 7। यह मंत्र तंत्रिका तंत्र (nervous system) पर तत्काल प्रभाव डालता है, हृदय की धड़कन को सामान्य करता है, और मस्तिष्क में उठने वाले अनियंत्रित विचारों के प्रवाह (thought-clutter) को रोककर तत्काल ग्राउंडिंग (grounding) प्रदान करता है 3। इसका मुख्य लक्ष्य मन, वाणी और शरीर—तीनों स्तरों पर उत्पन्न होने वाली उत्तेजना और नकारात्मकता को समूल नष्ट कर एक निर्बाध, गहरी और शाश्वत आत्मिक शांति की अनुभूति कराना है 7।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस त्रिविध शांति मंत्र का प्रत्यक्ष और अचूक प्रयोजन दैहिक (शारीरिक और मानसिक रोग/विकार), दैविक (प्राकृतिक या ब्रह्मांडीय आपदाएं और अदृश्य शक्तियां), और भौतिक (मनुष्यों, जंतुओं या बाह्य परिस्थितियों से उत्पन्न संघर्ष)—इन तीनों प्रकार के तापों और बाधाओं को तुरंत शांत करना है 7

02

यह मंत्र तंत्रिका तंत्र (nervous system) पर तत्काल प्रभाव डालता है, हृदय की धड़कन को सामान्य करता है, और मस्तिष्क में उठने वाले अनियंत्रित विचारों के प्रवाह (thought-clutter) को रोककर तत्काल ग्राउंडिंग (grounding) प्रदान करता है 3

03

इसका मुख्य लक्ष्य मन, वाणी और शरीर—तीनों स्तरों पर उत्पन्न होने वाली उत्तेजना और नकारात्मकता को समूल नष्ट कर एक निर्बाध, गहरी और शाश्वत आत्मिक शांति की अनुभूति कराना है

जाप विधि

सनातन धर्म के इस सबसे मूलभूत और अनिवार्य शांति मंत्र का जप किसी भी अन्य श्लोक, स्तुति, वैदिक ऋचा, या प्रार्थना के समापन पर किया जाता है 6। इसके अतिरिक्त, जब भी मन में अचानक क्रोध, भय, घबराहट (panic) या उद्वेग उत्पन्न हो, तब किसी भी स्थान या स्थिति में श्वास पर ध्यान केंद्रित करते हुए इसका मानसिक या वाचिक जप ३ बार किया जाना चाहिए 7। इसका उच्चारण करते समय 'ॐ' को दीर्घ रखना चाहिए, प्रथम 'शांति' का उच्चारण उच्च स्वर में, द्वितीय का मध्यम स्वर में, और तृतीय का अत्यंत मंद या फुसफुसाहट (whisper) के रूप में करना चाहिए, जो स्थूल से सूक्ष्म की ओर यात्रा का प्रतीक है 7।

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