तैत्तिरीय, कठ एवं श्वेताश्वतर उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) शांति मंत्र
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस मंत्र का प्रमुख प्रयोजन पारस्परिक संबंधों में उत्पन्न होने वाले द्वेष, वैचारिक मतभेद, और मानसिक उद्वेग (friction and cognitive dissonance) को शांत करना है 17। जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस मंत्र का प्रमुख प्रयोजन पारस्परिक संबंधों में उत्पन्न होने वाले द्वेष, वैचारिक मतभेद, और मानसिक उद्वेग (friction and cognitive dissonance) को शांत करना है 17। जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी कार्य या विद्या का अभ्यास करते हैं, तो अक्सर उनके ऊर्जा स्तरों के टकराव से अशांति उत्पन्न होती है; यह मंत्र उस आधिभौतिक अशांति को समाप्त कर एक सामंजस्यपूर्ण और शांत वातावरण (harmonious environment) का निर्माण करता है 1। इसका उद्देश्य शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को एकाग्र कर उसे रचनात्मक दिशा में मोड़ना, विद्या प्राप्ति में आने वाली आंतरिक बाधाओं (जैसे ईर्ष्या, आलस्य, या घमंड) की निवृत्ति करना, और अंततः साधक के भीतर और बाहर त्रिविध ताप की पूर्ण शांति स्थापित करना है 1।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस मंत्र का प्रमुख प्रयोजन पारस्परिक संबंधों में उत्पन्न होने वाले द्वेष, वैचारिक मतभेद, और मानसिक उद्वेग (friction and cognitive dissonance) को शांत करना है 17
जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी कार्य या विद्या का अभ्यास करते हैं, तो अक्सर उनके ऊर्जा स्तरों के टकराव से अशांति उत्पन्न होती है
यह मंत्र उस आधिभौतिक अशांति को समाप्त कर एक सामंजस्यपूर्ण और शांत वातावरण (harmonious environment) का निर्माण करता है 1
इसका उद्देश्य शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को एकाग्र कर उसे रचनात्मक दिशा में मोड़ना, विद्या प्राप्ति में आने वाली आंतरिक बाधाओं (जैसे ईर्ष्या, आलस्य, या घमंड) की निवृत्ति करना, और अंततः साधक के भीतर और बाहर त्रिविध ताप की पूर्ण शांति स्थापित करना है
जाप विधि
कृष्ण यजुर्वेदीय परंपरा का यह शांति मंत्र विशेष रूप से वेदाध्ययन, नवीन कार्य के शुभारंभ, योग अभ्यास के प्रारंभ या किसी भी सहयोगात्मक कार्य से पूर्व जपा जाता है 1। इसकी सर्वोत्कृष्ट जप विधि यह है कि इसे गुरु और शिष्य, अथवा साथ मिलकर कार्य करने वाले सभी व्यक्ति एक स्वर और एक लय में सामूहिक रूप से जपें 17। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए, आंखें बंद कर और श्वास को समभाव में लाकर इसका उच्चारण मध्यम और स्पष्ट स्वर में किया जाना चाहिए 19। व्यक्तिगत शांति के लिए इसे ध्यान से पूर्व ३, ११ या २१ बार जपा जा सकता है। जप के समय मन में द्वेषरहित और सहयोगात्मक ऊर्जा का संचार महसूस करना आवश्यक है 1।
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