तैत्तिरीय उपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद) शांति मंत्र
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति मंत्र का विशिष्ट प्रयोजन प्रकृति की सूक्ष्म और विराट शक्तियों (मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति, वायु) के साथ शरीर की ऊर्जा का संतुलन स्थापित कर आधिदैविक तापों (प्राकृतिक प्रकोप या ग्रहीय
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति मंत्र का विशिष्ट प्रयोजन प्रकृति की सूक्ष्म और विराट शक्तियों (मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति, वायु) के साथ शरीर की ऊर्जा का संतुलन स्थापित कर आधिदैविक तापों (प्राकृतिक प्रकोप या ग्रहीय अशांति) को शांत करना है 9। यह मंत्र साधक के शारीरिक अंगों, प्राण वायु, और मानसिक वृत्तियों के मध्य एक गहरा समन्वय (synchronization) उत्पन्न करता है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब शरीर में अज्ञात बेचैनी हो, मानसिक स्थिरता भंग हो रही हो, या वातावरण में नकारात्मकता का आभास हो 11। यह सत्य और ऋत (ब्रह्मांडीय नियम) के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक निर्भयता और असीम आंतरिक शांति प्रदान करता है, तथा वातावरण की संपूर्ण शुद्धि कर ध्यान के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि तैयार करता है 18।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति मंत्र का विशिष्ट प्रयोजन प्रकृति की सूक्ष्म और विराट शक्तियों (मित्र, वरुण, अर्यमा, इंद्र, बृहस्पति, वायु) के साथ शरीर की ऊर्जा का संतुलन स्थापित कर आधिदैविक तापों (प्राकृतिक प्रकोप या ग्रहीय अशांति) को शांत करना है 9
यह मंत्र साधक के शारीरिक अंगों, प्राण वायु, और मानसिक वृत्तियों के मध्य एक गहरा समन्वय (synchronization) उत्पन्न करता है
इसका उपयोग तब किया जाता है जब शरीर में अज्ञात बेचैनी हो, मानसिक स्थिरता भंग हो रही हो, या वातावरण में नकारात्मकता का आभास हो 11
यह सत्य और ऋत (ब्रह्मांडीय नियम) के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक निर्भयता और असीम आंतरिक शांति प्रदान करता है, तथा वातावरण की संपूर्ण शुद्धि कर ध्यान के लिए उपयुक्त पृष्ठभूमि तैयार करता है
जाप विधि
इस विस्तृत वैदिक शांति मंत्र का जप मुख्य रूप से स्वाध्याय (अध्ययन), गंभीर ध्यान सत्र के प्रारंभ में, या किसी अनुष्ठान के संकल्प से पूर्व मन और शरीर को प्राकृतिक शक्तियों के साथ एकाकार करने के लिए किया जाता है 18। साधक को पूर्णतः पवित्र होकर, ब्रह्म मुहूर्त या दिन के किसी भी शांत प्रहर में पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशासन पर बैठना चाहिए। नेत्रों को बंद कर, दोनों हाथों को गोद में रखकर, मंत्र का उच्चारण स्पष्ट, लयबद्ध और वैदिक अनुनासिक स्वरों का ध्यान रखते हुए करना चाहिए। यदि संस्कृत उच्चारण में कठिनाई न हो, तो इसे बिना रुके एक श्वास चक्र में एक पंक्ति के अनुपात से जपना चाहिए 19। जप के पश्चात् १०-१५ मिनट तक पूर्ण मौन धारण करना इसकी जप विधि का अभिन्न अंग है, ताकि मंत्र से उत्पन्न गुंजन शरीर के नाड़ी तंत्र में अवशोषित हो सके 18।
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शेरावाली
kavach mantraपातु श्रवणे वासरेश्वर घ्राणं धर्म पातु पदन वेदवाहन जीवा मानद पातु कंठ में सुरवंदित स्कंद प्रभाकर पातु वक्ष पातु जन प्रिय पातु पाद द्वादशात्मा सर्व सर्वांग सकलेश्वर यक्ष गन्धर्व राक्षसाः ब्रह्मराक्षस वेतालाः क्षमा दूरा देव पलायंते तस्य संकीर्तना अज्ञात कवच दिव्य यो जपे सूर्य मंत्रम् सिद्धि जायते तस्य कल्पकोटि शतैरपि। इति श्री ब्रह्मयामले त्रैलोक्य मंगलम नाम सूर्य कवचम संपूर्णम। 15
sabar mantraराम कुण्डली, ब्रह्मचाक । तेतीस कोटि देवा देवा अमुक की बेड़ियां । अमुकेर अंकेर बाण काटम्। शर काटम् । संधान काटम् । कुज्ञान काटम् । कारवणे काटे । राजा रामचन्द्रेर आज्ञा । राजा रामचन्द्ररे ऐई झण्डी अमुकेर अंगे शीघ्र लागूगे 25
beej mantraब्रां
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gyan mantraया कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥