ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
यजुर्वेद (३६:१७) एवं अथर्ववेद शांति पाठ

यजुर्वेद (३६:१७) एवं अथर्ववेद शांति पाठ शांति मंत्र

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

इस मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन व्यक्तिगत शांति की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन और वातावरणीय शुद्धि स्थापित करना है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब मन बाह्य परिस्थितियों, प्राकृतिक उथल-पुथल

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशांति मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन व्यक्तिगत शांति की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन और वातावरणीय शुद्धि स्थापित करना है। इसका उपयोग तब किया जाता है जब मन बाह्य परिस्थितियों, प्राकृतिक उथल-पुथल या वैश्विक अशांति के कारण अत्यधिक विचलित हो 11। यह मंत्र अंतरिक्ष, जल, पृथ्वी, वनस्पतियों और समस्त ईश्वरीय शक्तियों में व्याप्त ऊर्जा को शांत करता है और आधिदैविक (प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय) आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए जपा जाता है 9। इसके अतिरिक्त, जब व्यक्ति स्वयं को प्रकृति से कटा हुआ महसूस करता है, तब यह मंत्र उसके मनोदैहिक तंत्र को संपूर्ण सृष्टि की लय के साथ जोड़कर एक अत्यंत गहरी, अभेद्य और शाश्वत मानसिक शांति प्रदान करता है 11।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन व्यक्तिगत शांति की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण ब्रह्मांडीय संतुलन और वातावरणीय शुद्धि स्थापित करना है

02

इसका उपयोग तब किया जाता है जब मन बाह्य परिस्थितियों, प्राकृतिक उथल-पुथल या वैश्विक अशांति के कारण अत्यधिक विचलित हो 11

03

यह मंत्र अंतरिक्ष, जल, पृथ्वी, वनस्पतियों और समस्त ईश्वरीय शक्तियों में व्याप्त ऊर्जा को शांत करता है और आधिदैविक (प्राकृतिक और ब्रह्मांडीय) आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए जपा जाता है 9

04

इसके अतिरिक्त, जब व्यक्ति स्वयं को प्रकृति से कटा हुआ महसूस करता है, तब यह मंत्र उसके मनोदैहिक तंत्र को संपूर्ण सृष्टि की लय के साथ जोड़कर एक अत्यंत गहरी, अभेद्य और शाश्वत मानसिक शांति प्रदान करता है

जाप विधि

इस महाशांति मंत्र का जप मुख्य रूप से किसी भी वृहद यज्ञ, अनुष्ठान की पूर्णता, अथवा प्रकृति के सान्निध्य में ध्यान करते समय किया जाता है। साधक को प्रातःकाल सूर्योदय के समय या सांध्य बेला में खुले आसमान के नीचे या एकांत कक्ष में सुखासन में बैठना चाहिए 11। दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में घुटनों पर रखकर, श्वास को गहरा और धीमा करते हुए इस मंत्र का उच्चारण अत्यंत शांत, गंभीर और लयबद्ध स्वर में करना चाहिए। यदि किसी विशेष प्रयोजन या वातावरणीय शुद्धि के लिए इसका अनुष्ठान करना हो, तो रुद्राक्ष की माला से १०८ बार या कम से कम ११ बार इसका जप करना आवश्यक है। प्रत्येक तत्व (जैसे द्यौः, अंतरिक्ष, पृथिवी) का नाम लेते समय मन में उस तत्व की विशालता और शांति का भाव (visualization) लाना चाहिए 12। अंत में तीन बार शांति का उच्चारण करते समय अपनी नाभि, हृदय और आज्ञा चक्र में स्पंदन का अनुभव करना चाहिए 7।

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