प्रश्न, माण्डूक्य एवं मुण्डक उपनिषद (अथर्ववेद शांति पाठ) शांति मंत्र
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः । भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः । व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः । स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन हमारी ज्ञानेन्द्रियों (विशेषकर श्रवण और दृष्टि) और कर्मेंद्रियों को शुद्ध, शांत और सकारात्मक ऊर्जा की ओर प्रवृत्त करना है 18। आधुनिक जीवनशैली में जहां मन अनवरत नकारा
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन हमारी ज्ञानेन्द्रियों (विशेषकर श्रवण और दृष्टि) और कर्मेंद्रियों को शुद्ध, शांत और सकारात्मक ऊर्जा की ओर प्रवृत्त करना है 18। आधुनिक जीवनशैली में जहां मन अनवरत नकारात्मक सूचनाओं, तनावपूर्ण दृश्यों और अशान्त ध्वनियों से घिर कर अवसाद और व्याकुलता का शिकार हो जाता है, वहां यह मंत्र एक अभेद्य मनोवैज्ञानिक सुरक्षा चक्र का निर्माण करता है 3। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हम केवल शुभ और कल्याणकारी विचारों को ही ग्रहण करें। इसके अतिरिक्त, यह मंत्र शारीरिक स्वास्थ्य और अंगों की दृढ़ता ('स्थिरैरङ्गै') के लिए जपा जाता है, ताकि व्यक्ति बिना किसी व्याधि या शारीरिक अशांति के पूर्ण मानसिक संतुलन का अनुभव कर सके 23। आधिभौतिक स्तर पर, यह मंत्र हमारे आस-पास के वातावरण को शांत करता है और दैहिक, दैविक एवं भौतिक—तीनों प्रकार के तापों और विघ्नों का समूल नाश कर साधक को अगाध आत्मिक शांति में स्थापित करता है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति मंत्र का सर्वोपरि प्रयोजन हमारी ज्ञानेन्द्रियों (विशेषकर श्रवण और दृष्टि) और कर्मेंद्रियों को शुद्ध, शांत और सकारात्मक ऊर्जा की ओर प्रवृत्त करना है 18
आधुनिक जीवनशैली में जहां मन अनवरत नकारात्मक सूचनाओं, तनावपूर्ण दृश्यों और अशान्त ध्वनियों से घिर कर अवसाद और व्याकुलता का शिकार हो जाता है, वहां यह मंत्र एक अभेद्य मनोवैज्ञानिक सुरक्षा चक्र का निर्माण करता है 3
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हम केवल शुभ और कल्याणकारी विचारों को ही ग्रहण करें
इसके अतिरिक्त, यह मंत्र शारीरिक स्वास्थ्य और अंगों की दृढ़ता ('स्थिरैरङ्गै') के लिए जपा जाता है, ताकि व्यक्ति बिना किसी व्याधि या शारीरिक अशांति के पूर्ण मानसिक संतुलन का अनुभव कर सके 23
जाप विधि
अथर्ववेदीय परंपरा से उद्गमित इस अत्यंत शक्तिशाली शांति पाठ का जप मुख्य रूप से किसी भी गंभीर ध्यानाभ्यास, वैदिक अनुष्ठान, या ज्ञान-सत्र के उद्घाटन से पूर्व किया जाता है 18। साधक को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर, एक शुद्ध और एकांत स्थान पर कुशा या ऊन के आसन पर पद्मासन अथवा सिद्धासन में विराजित होना चाहिए। शरीर की पूर्ण स्थिरता इस मंत्र के जप की प्राथमिक शर्त है। नेत्रों को कोमलता से बंद रखते हुए अपना ध्यान आज्ञा चक्र अथवा अपनी श्रवणेंद्रियों (कानों) पर केंद्रित करना चाहिए 23। मंत्र का उच्चारण अत्यंत स्पष्ट और मध्यम स्वर में होना चाहिए। यदि इसे दैनिक साधना का अंग बनाना हो, तो रुद्राक्ष की माला का उपयोग करते हुए १०८ बार जप का विधान है 5। प्रत्येक आवृत्ति के पश्चात कुछ क्षण का मौन रखना चाहिए, और अंत में उच्चरित होने वाले 'शांतिः शांतिः शांतिः' के साथ श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ना (रेचक) चाहिए 9।
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