ऐतरेय उपनिषद (ऋग्वेद शांति पाठ) शांति मंत्र
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः । श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति पाठ का केंद्रीय प्रयोजन वाणी (कथन) और मन (विचार) के मध्य उत्पन्न होने वाले असंतुलन और अंतर्द्वंद्व (cognitive dissonance) को पूर्णतः शांत करना है 18। जब व्यक्ति के विचार कुछ और होते हैं तथा व
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति पाठ का केंद्रीय प्रयोजन वाणी (कथन) और मन (विचार) के मध्य उत्पन्न होने वाले असंतुलन और अंतर्द्वंद्व (cognitive dissonance) को पूर्णतः शांत करना है 18। जब व्यक्ति के विचार कुछ और होते हैं तथा वाणी से कुछ और व्यक्त होता है, तो स्नायुतंत्र में एक प्रकार का तनाव (stress) उत्पन्न होता है, जो ध्यान और मानसिक शांति में सबसे बड़ी बाधा है। यह मंत्र इस मनोवैज्ञानिक बिखराव को रोककर वाणी और मन को एक ही धुरी पर स्थिर करता है 27। इसका उपयोग वैचारिक शुद्धि, मानसिक उद्वेग की समाप्ति, और आध्यात्मिक एकाग्रता में वृद्धि के लिए किया जाता है। साथ ही, यह मंत्र आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों को शांत कर वातावरण में सत्य, प्रामाणिकता और गहन मानसिक मौन (inner silence) की स्थापना करता है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति पाठ का केंद्रीय प्रयोजन वाणी (कथन) और मन (विचार) के मध्य उत्पन्न होने वाले असंतुलन और अंतर्द्वंद्व (cognitive dissonance) को पूर्णतः शांत करना है 18
जब व्यक्ति के विचार कुछ और होते हैं तथा वाणी से कुछ और व्यक्त होता है, तो स्नायुतंत्र में एक प्रकार का तनाव (stress) उत्पन्न होता है, जो ध्यान और मानसिक शांति में सबसे बड़ी बाधा है
यह मंत्र इस मनोवैज्ञानिक बिखराव को रोककर वाणी और मन को एक ही धुरी पर स्थिर करता है 27
इसका उपयोग वैचारिक शुद्धि, मानसिक उद्वेग की समाप्ति, और आध्यात्मिक एकाग्रता में वृद्धि के लिए किया जाता है
जाप विधि
ऋग्वेद की शाखा से संबंधित इस शांति मंत्र का जप वेदाध्ययन, आत्म-निरीक्षण (introspection), और ध्यान के अभ्यास से पूर्व मन और वाणी की एकाग्रता स्थापित करने के लिए किया जाता है 18। साधक को शांत मुद्रा में बैठकर, मेरुदंड सीधा रखते हुए अपनी दृष्टि को नासिकाग्र (नाक के पोर) या भ्रूमध्य पर टिकाना चाहिए। इस मंत्र का जप करते समय अपना पूरा ध्यान कंठ (विशुद्धि चक्र) और मस्तिष्क (आज्ञा चक्र) के बीच होने वाले ऊर्जा के प्रवाह पर केंद्रित करना चाहिए। इसका उच्चारण अत्यंत धीमा होना चाहिए, जिससे वाणी और मन के मध्य का तालमेल मानसिक रूप से अनुभव किया जा सके 27। किसी विशेष मानसिक विक्षोभ या ध्यान में भटकाव की स्थिति में, इसे २१ या ५१ बार स्फटिक की माला से जपना अत्यंत फलदायी है 5।
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