बृहदारण्यक उपनिषद (१.३.२८) शांति मंत्र
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माऽमृतं गमय ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
इस शांति मंत्र का मूल प्रयोजन साधक के भीतर अज्ञानता जनित मानसिक अंधकार, अनिश्चितताओं के भय और मृत्यु-भय से उत्पन्न होने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक तनाव (anxiety and existential dread) को पूर्णतः शांत करना
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस शांति मंत्र का मूल प्रयोजन साधक के भीतर अज्ञानता जनित मानसिक अंधकार, अनिश्चितताओं के भय और मृत्यु-भय से उत्पन्न होने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक तनाव (anxiety and existential dread) को पूर्णतः शांत करना है 11। जब मनुष्य सांसारिक द्वंद्वों, असत्य प्रवृत्तियों और अवसाद (depression) से ग्रसित होता है, तब यह मंत्र उसकी चेतना को स्थिर कर भावनात्मक संतुलन (emotional balance) प्रदान करता है 3। इसका उद्देश्य वैचारिक स्तर पर प्रगाढ़ शुद्धता लाना, नकारात्मक विचारों को विसर्जित कर आध्यात्मिक प्रकाश (ज्योति) का संचार करना, और साधक को आत्म-साक्षात्कार के शांत मार्ग पर निर्विघ्न अग्रसर करना है 11। यह आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों को शांत कर परम आंतरिक संतुलन स्थापित करता है 9।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस शांति मंत्र का मूल प्रयोजन साधक के भीतर अज्ञानता जनित मानसिक अंधकार, अनिश्चितताओं के भय और मृत्यु-भय से उत्पन्न होने वाले गहरे मनोवैज्ञानिक तनाव (anxiety and existential dread) को पूर्णतः शांत करना है 11
जब मनुष्य सांसारिक द्वंद्वों, असत्य प्रवृत्तियों और अवसाद (depression) से ग्रसित होता है, तब यह मंत्र उसकी चेतना को स्थिर कर भावनात्मक संतुलन (emotional balance) प्रदान करता है 3
इसका उद्देश्य वैचारिक स्तर पर प्रगाढ़ शुद्धता लाना, नकारात्मक विचारों को विसर्जित कर आध्यात्मिक प्रकाश (ज्योति) का संचार करना, और साधक को आत्म-साक्षात्कार के शांत मार्ग पर निर्विघ्न अग्रसर करना है 11
यह आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों को शांत कर परम आंतरिक संतुलन स्थापित करता है
जाप विधि
पवमान मंत्र के नाम से प्रसिद्ध इस उपनिषदिक शांति पाठ का जप मुख्य रूप से आत्म-चिंतन, ध्यान सत्र के आरंभ, वेदांत के अध्ययन से पूर्व, अथवा निद्रा से पूर्व किया जाना चाहिए। साधक को स्थिर शरीर के साथ पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को पूर्णतः सीधा रखना चाहिए 12। नेत्रों को बंद कर अपना ध्यान भृकुटी (दोनों भौंहों के मध्य) पर केंद्रित करें। मंत्र का उच्चारण करते समय स्वर में आर्त भाव (विनम्रता और समर्पण) होना चाहिए। इसे मानसिक जप (बिना होठ हिलाए) या उपांशु जप (केवल स्वयं को सुनाई दे) के रूप में १०८ बार जपा जा सकता है 5। विशेष रूप से जब मन अत्यंत भ्रमित हो, तो इस मंत्र को श्वास की गति के साथ जोड़कर जपें—गहरी श्वास भीतर लेते हुए सकारात्मकता का अनुभव करें और उच्चारण के साथ श्वास बाहर छोड़ते हुए मानसिक अंधकार को बाहर निकालें 11।
विशेष टिप्पणियाँ
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jap mantraसोऽहम्
beej mantraक्ष्रौं
bhakti mantraॐ श्री रामः शरणं मम