ब्रह्म / मेधा सूक्त (३२.१६) वैदिक मंत्र
ॐ अप्सरासु च या मेधा गन्धर्वेषु च यन्मनः । दैवीं मेधा सरस्वती सा मां मेधा सुरभिर्जुषतां स्वाहा ॥
ज्ञान की सर्वव्यापकता का बोध, रचनात्मकता (Creativity) का विकास एवं कला व विद्या में निपुणता।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
ज्ञान की सर्वव्यापकता का बोध, रचनात्मकता (Creativity) का विकास एवं कला व विद्या में निपुणता।
इस मंत्र से क्या होगा?
ज्ञान की सर्वव्यापकता का बोध, रचनात्मकता (Creativity) का विकास एवं कला व विद्या में निपुणता
जाप विधि
बौद्धिक प्रतियोगिताओं या परीक्षाओं से पूर्व इष्ट-स्मरण करते हुए एक बार स्पष्ट उच्चारण।
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क्लीं क्लीं हूं
beej mantraयं
kavach mantraक्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥ ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्ठं सदावतु । रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥ नीलुत्वल दलश्यामा शत्रु संघ विदारणी नरमुंड तथा खगम कमलम च वरम तथा निर्भयाम रक्त बदनाम दस्ताली घोर रूपणी शवासनताम काली मुंडमाला विभूषिताम सर्वाङ्गं पातु मे देवी सर्व संपत् करे शुभे सर्व देव स्तु ते देवी कालिके तवाम नमाम यहम 23
shanti mantraॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
siddh mantraॐ पक्षि स्वाहा
navgrah mantraॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः॥