भाववृत्त / अघमर्षण सूक्त (१०.१९०.३) वैदिक मंत्र
ॐ सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं च अन्तरिक्षमथो स्वः ॥
सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था का स्मरण, मानसिक स्थिरता एवं पाप-प्रवृत्तियों का पूर्ण विसर्जन।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था का स्मरण, मानसिक स्थिरता एवं पाप-प्रवृत्तियों का पूर्ण विसर्जन।
इस मंत्र से क्या होगा?
सृष्टि की शाश्वत व्यवस्था का स्मरण, मानसिक स्थिरता एवं पाप-प्रवृत्तियों का पूर्ण विसर्जन
जाप विधि
बाईं नासिका से श्वास छोड़ते (रेचक) हुए मानसिक जप। जल मार्जन के साथ भी इसका सस्वर उपयोग।
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