संज्ञान / संगठन सूक्त (१०.१९१.२) वैदिक मंत्र
ॐ सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना।
इस मंत्र से क्या होगा?
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना
जाप विधि
सामाजिक सम्मेलनों, सामूहिक उपासना अथवा यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् उपस्थित जन-समूह द्वारा एक स्वर में सस्वर पाठ।
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इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे। युजं वृत्रेषु वज्रिणम्॥
siddh mantraॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट् ॥
ugra mantraॐ क्रीं हूं क्रीं सर्व शत्रु स्तंभिनी घोर कालिकायै फट्
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tantrik mantraॐ क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ह्रीं ह्रीं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा