संज्ञान / संगठन सूक्त (१०.१९१.२) वैदिक मंत्र
ॐ सङ्गच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते ॥
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना।
इस मंत्र से क्या होगा?
समाज में एकता, वैचारिक सामंजस्य, संगठन शक्ति की वृद्धि एवं भ्रातृत्व भाव की स्थापना
जाप विधि
सामाजिक सम्मेलनों, सामूहिक उपासना अथवा यज्ञ की पूर्णाहुति के पश्चात् उपस्थित जन-समूह द्वारा एक स्वर में सस्वर पाठ।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
ॐ ऐं इन्द्राय नमः (वैवाहिक सिद्धि हेतु: ॐ लं इन्द्राय नमः)
stotra mantraपूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः । अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥ 12
kavach mantraॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥ अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥ शाकिनी तथा अंतरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाय प्रभु तपिश न धीर वृषभ वृषभ लो कुष्मांडा ब्रॉदर यह नश्यंति दर्शनात्तस्य कवचे 9
beej mantraद्रीं
jap mantraश्री राम जय राम जय जय राम
tantrik mantraॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा