यज्ञ / यज्ञ नाभि मंत्र (२३.६२) वैदिक मंत्र
ॐ इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः । अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम ॥
यज्ञ-स्थली का पवित्रीकरण एवं यज्ञ को सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा व सृष्टि के नाभि-केन्द्र के रूप में स्थापित करना।
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यह मंत्र क्यों?
यज्ञ-स्थली का पवित्रीकरण एवं यज्ञ को सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा व सृष्टि के नाभि-केन्द्र के रूप में स्थापित करना।
इस मंत्र से क्या होगा?
यज्ञ-स्थली का पवित्रीकरण एवं यज्ञ को सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय ऊर्जा व सृष्टि के नाभि-केन्द्र के रूप में स्थापित करना
जाप विधि
यज्ञ-वेदी (हवन कुण्ड) के निर्माण, मार्जन एवं वेदी में प्रथम अग्नि-स्थापना के समय सस्वर उच्चारण।
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यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥
mool mantraॐ हुं हुं शत्रुस्तम्भनाय हुं हुं ॐ फट्
jap mantraॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः
kaamya mantraॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
kavach mantraक्रीं कालिकायै स्वाहा मम नाभिं सदावतु ॥ ह्रीं कालिकायै स्वाहा मम पृष्ठं सदावतु । रक्तबीजविनाशिन्यै स्वाहा हस्तौ सदावतु ॥ नीलुत्वल दलश्यामा शत्रु संघ विदारणी नरमुंड तथा खगम कमलम च वरम तथा निर्भयाम रक्त बदनाम दस्ताली घोर रूपणी शवासनताम काली मुंडमाला विभूषिताम सर्वाङ्गं पातु मे देवी सर्व संपत् करे शुभे सर्व देव स्तु ते देवी कालिके तवाम नमाम यहम 23
sabar mantraओम चौकी हनुमत वीर की बाण ध्वजा फहराए मारू मारू मारुत सुत मुष्टिक शत्रु नसाय मेरे इष्ट रामचंद्र जी अगुवा हनुमंता वीर चौकी सुदर्शन चक्र की रक्षा करें शरीर टोना ब्रह्म भूत प्रेत संग डाईन डाकिनी सांप बिच्छू चोर बट सब कुछ निष्फल जाई 6