अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.६) वैदिक मंत्र
ॐ त्वं नो अग्ने महोभिः पाहि विश्वस्या अरातेः । उत द्विषो मर्त्यस्य ॥
ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुओं के नकारात्मक प्रभाव से आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा, तथा सुख-संपन्नता की प्राप्ति।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुओं के नकारात्मक प्रभाव से आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा, तथा सुख-संपन्नता की प्राप्ति।
इस मंत्र से क्या होगा?
ईर्ष्या, द्वेष और शत्रुओं के नकारात्मक प्रभाव से आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा, तथा सुख-संपन्नता की प्राप्ति
जाप विधि
घोर संकट के समय, रोग अथवा शत्रुओं के भय से मुक्ति पाने हेतु नित्य साम-गान या मानसिक जप।
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