मन / शिवसंकल्प सूक्त (३४.२) वैदिक मंत्र
ॐ येन कर्मण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः । यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ।।
कर्म-कौशल में वृद्धि, शोध-कार्यों में सफलता, दृढ़ मानसिक संकल्प एवं कार्य में निरंतरता की प्राप्ति।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
कर्म-कौशल में वृद्धि, शोध-कार्यों में सफलता, दृढ़ मानसिक संकल्प एवं कार्य में निरंतरता की प्राप्ति।
इस मंत्र से क्या होगा?
कर्म-कौशल में वृद्धि, शोध-कार्यों में सफलता, दृढ़ मानसिक संकल्प एवं कार्य में निरंतरता की प्राप्ति
जाप विधि
किसी भी नवीन बौद्धिक, वैज्ञानिक या यज्ञीय कार्य के शुभारम्भ से पूर्व मानसिक रूप से १ बार जप।
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ॐ हसां हसीं हसूं हसैं हसौं हसः
tantrik mantraक ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं स क ल ह्रीं
kavach mantraऊरू रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत्। जानुनी सेतुकृत् पातु जङ्घे दशमुखान्तकः। पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः। एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत्। स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्। पातालभूतलव्योम- चारिणश्छद्मचारिणः। न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः। रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति। जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्। यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः। वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्। अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमङ्गलम्। 34
navgrah mantraॐ कें केतवे नमः
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