लोना चमारिन (मोहिनी विद्या एवं अचूक वशीकरण) शाबर मंत्र
दुहाई लोना चमारिन की, आन बीर मसान की (अमुक का नाम) 20
इस अमोघ मंत्र का प्रधान प्रयोजन अचूक वशीकरण, तीव्र सम्मोहन और रूठे हुए या दूर जाते व्यक्तियों को बलपूर्वक अपने समीप लाना है 20। यदि कार्यक्षेत्र (ऑफिस), परिवार या समाज में कोई व्यक्ति निरंतर दूर जा रह
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
इस अमोघ मंत्र का प्रधान प्रयोजन अचूक वशीकरण, तीव्र सम्मोहन और रूठे हुए या दूर जाते व्यक्तियों को बलपूर्वक अपने समीप लाना है 20। यदि कार्यक्षेत्र (ऑफिस), परिवार या समाज में कोई व्यक्ति निरंतर दूर जा रहा हो, या लाख यत्नों के बाद भी संबंध मधुर न हो रहे हों, तो यह मंत्र सीधे लक्षित व्यक्ति के अवचेतन मन (Subconscious Mind) पर प्रहार करता है 21। लोना चमारिन की 'दुहाई' और 'बीर मसान की आन' का उपयोग कर श्मशान की मोहिनी ऊर्जा को जाग्रत किया जाता है, जो लक्षित व्यक्ति के मन में साधक के प्रति तीव्र, अनियंत्रित और सम्मोहक आकर्षण उत्पन्न करती है, जिससे वह व्यक्ति स्वयं साधक के समीप आने को विवश हो जाता है 20।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस अमोघ मंत्र का प्रधान प्रयोजन अचूक वशीकरण, तीव्र सम्मोहन और रूठे हुए या दूर जाते व्यक्तियों को बलपूर्वक अपने समीप लाना है 20
यदि कार्यक्षेत्र (ऑफिस), परिवार या समाज में कोई व्यक्ति निरंतर दूर जा रहा हो, या लाख यत्नों के बाद भी संबंध मधुर न हो रहे हों, तो यह मंत्र सीधे लक्षित व्यक्ति के अवचेतन मन (Subconscious Mind) पर प्रहार करता है 21
लोना चमारिन की 'दुहाई' और 'बीर मसान की आन' का उपयोग कर श्मशान की मोहिनी ऊर्जा को जाग्रत किया जाता है, जो लक्षित व्यक्ति के मन में साधक के प्रति तीव्र, अनियंत्रित और सम्मोहक आकर्षण उत्पन्न करती है, जिससे वह व्यक्ति स्वयं साधक के समीप आने को विवश हो जाता है
जाप विधि
अघोर और शाबर तंत्र में 'लोना चमारिन' (जो गुरु गोरखनाथ और इस्माइल जोगी के समकक्ष एक अत्यंत सिद्ध तांत्रिक महिला मानी जाती हैं) की वशीकरण और आकर्षण साधना अत्यंत उग्र, त्वरित और गुप्त मानी गई है 20। मंत्र जप के समय रिक्त स्थान (अमुक) पर उस इष्ट या लक्षित व्यक्ति का नाम लेना अनिवार्य है जिसे वशीभूत करना अभीष्ट हो 20। इस अनुष्ठान में ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत कठोरता से करना होता है, क्योंकि यह सीधे काम-ऊर्जा (Sexual Energy) पर प्रहार करता है 23। साधना काल के दौरान साधक की कड़ी मनोवैज्ञानिक व आध्यात्मिक परीक्षा हो सकती है; तंत्र की शक्तियां या स्वयं देवी अत्यंत मोहक स्वरूप में साधक के समक्ष प्रकट हो सकती हैं, जिससे उसकी कामवासना जाग्रत हो सकती है 23। साधक को पूर्ण धैर्य बनाए रखना होता है तथा किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से बचना होता है 23। यदि साधक विचलित होकर वीर्यपात (शीघ्रपतन) कर बैठता है, तो साधना उसी क्षण खंडित हो जाती है, यद्यपि देवी कोई अहित नहीं करतीं और साधक पुनः प्रयास कर सकता है। यह साधना रातों-रात चमत्कारिक परिणाम दिखाने में सक्षम है, अतः इत्र (Ittar) का प्रयोग कर, पूर्ण एकाग्रता और आंख मूंदकर ध्यान की अवस्था में इसका जप किया जाता है 21।
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