एकादश रुद्र (कपाली रुद्र) मूल मंत्र
ॐ हुं हुं शत्रुस्तम्भनाय हुं हुं ॐ फट्
अहंकार के शमन, घोर शत्रुओं के स्तम्भन, नकारात्मक शक्तियों के पूर्ण विनाश एवं दरिद्रता व अस्थिरता से बचाव करते हुए उत्तम स्वास्थ्य और न्याय की प्राप्ति 6।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
अहंकार के शमन, घोर शत्रुओं के स्तम्भन, नकारात्मक शक्तियों के पूर्ण विनाश एवं दरिद्रता व अस्थिरता से बचाव करते हुए उत्तम स्वास्थ्य और न्याय की प्राप्ति 6।
इस मंत्र से क्या होगा?
अहंकार के शमन, घोर शत्रुओं के स्तम्भन, नकारात्मक शक्तियों के पूर्ण विनाश एवं दरिद्रता व अस्थिरता से बचाव करते हुए उत्तम स्वास्थ्य और न्याय की प्राप्ति
जाप विधि
वैदिक पुरोहितों के निर्देशन में या एकांत साधना के रूप में ४५ दिनों का अनुष्ठान किया जाता है। रुद्राक्ष की माला पर पूर्ण संयम के साथ इस मंत्र का जप किया जाता है 6।
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पद्मनाभ
shanti mantraॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
kavach mantraस्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ 14
sabar mantraॐ नमो आदेश गुरु का आदेश काली काली महाकाली इन्द्र की बेटी ब्रम्हा की साली चाम की गठरी हाड़ की माला भजो आनन्द सुंदरी बाला। भरपूर वसन करले उठाई काम क्रन्ति कलिका आई लुच्ची मोहन भोग भेट कड़ाही जहा भेजा वहा जाई कष्ट दुखो से लेव बचाई सभी देत्यन को मार भगाई आदि अंत तू रही सहाई में पूत तू मेरी माई सब दुखन से लेव बचाई गुरु की शक्ति हमारी भक्ति फुरे मंत्र दोहाई काली की ईश्वरो वाचा 12
beej mantraदं
dhyan mantraॐ जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतलक्षणम्। लोचनत्रयसंयुक्तं पातु मां सर्वतोमुखीम्॥