दक्षिणा काली तांत्रिक तांत्रिक मंत्र
ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ह्रीं ह्रीं हूं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा
अष्ट सिद्धि की प्राप्ति, भूत-प्रेत तथा अघोर बाधा निवारण, सांसारिक बंधनों से मुक्ति, तथा साधक के भीतर के क्रोध, काम और अहंकार का पूर्ण विनाश 8।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
अष्ट सिद्धि की प्राप्ति, भूत-प्रेत तथा अघोर बाधा निवारण, सांसारिक बंधनों से मुक्ति, तथा साधक के भीतर के क्रोध, काम और अहंकार का पूर्ण विनाश 8।
इस मंत्र से क्या होगा?
अष्ट सिद्धि की प्राप्ति, भूत-प्रेत तथा अघोर बाधा निवारण, सांसारिक बंधनों से मुक्ति, तथा साधक के भीतर के क्रोध, काम और अहंकार का पूर्ण विनाश
जाप विधि
गुरु दीक्षा के उपरांत ही इस बाईस अक्षरी (Bais Akshari) मंत्र का जप अनुमत है। यह साधना रात्रि काल में स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से की जाती है। एक कालखंड में न्यूनतम 11 माला का जप आवश्यक है। साधक का मुख उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। जप पूर्ण होने के पश्चात् आम की समिधा पर लौंग, काले तिल और गुग्गुल के मिश्रण से दशांश हवन करना अनिवार्य है। हवन की भस्म (विभूति) को सुरक्षित रखा जाता है 14।
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ॐ आदित्याय नमः
naam mantraवैकुण्ठनाथ
kaamya mantraसर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य हृदि संस्थिते। स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
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stotra mantraताः सर्वाःप्रशमं यान्ति व्यासोब्रूते न संशयः ॥ 35
sabar mantraधन जैसे चुंबक खींचे लोह गोरख की आज्ञा टले नहीं मिटे साधक का मोह कीड़ा जागे पिंगला जागे सुष्मना का खुले द्वार जब तीनों नाड़ी जागे धन आवे बारंबार जैसे गंगा बहे अविरल जैसे सूरज देत उजास वैसे मेरे घर में लक्ष्मी करे सदा ही वास रुका धन चले बंद धन खुले आवे चहुं ओर से धन गोरख का शब्द सांचा रे सांचा रे गुरु का मन काल का भी काल है गोरख तीनों लोक बसेरा जो गोरख का नाम ले साधक उसका होए उजेरा उठ उठ लक्ष्मी आव बैठ मेरे द्वार गोरख की आज्ञा लेकर आव कर मेरा उद्धार शब्द सांचा पिंड कांचा सांची गुरु की बानी हुकुम गोरखनाथ का चले यही नाथ की निशानी 5