श्री कृष्ण (जगद्गुरु स्वरूप) ध्यान मंत्र
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
परमानंद की अनुभूति, मन के भीतर बैठे अज्ञान रूपी वृत्तियों का नाश, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए ईश्वर से जुड़ाव।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
परमानंद की अनुभूति, मन के भीतर बैठे अज्ञान रूपी वृत्तियों का नाश, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए ईश्वर से जुड़ाव।
इस मंत्र से क्या होगा?
परमानंद की अनुभूति, मन के भीतर बैठे अज्ञान रूपी वृत्तियों का नाश, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए ईश्वर से जुड़ाव
जाप विधि
पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर इस श्लोक का मानसिक मनन करें। कृष्ण को ब्रह्मांड के परम गुरु मानकर शरणागति का भाव रखें और श्वास को सामान्य रखते हुए अर्थ का अनुभव करें।
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श्रीं क्लीं श्रीं॥
gyan mantraॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः ॥
mool mantraॐ श्रीं बं सौं बलवर्धनाय बालेश्वराय रुद्राय फट् ॐ
jap mantraॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
sabar mantraभैरव शिव का चेला जहां जहां-जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड काचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा ओम गुरु जी गोरख जति मच्छिंद्र का चेला शिव के रूप में दिखे अलबेला कानों कुंडल गले में नादी हाथ त्रिशूल नाथ है आदि अलख पुरुष को करूं आदेश जन्म जन्म के काटो कलेश भगवा वेश हाथ में खप्पर भैरव शिव का चेला जहां जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा 2
beej mantraक्ष्रौं