ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण

ध्यान मंत्र

ध्यान और चिंतन हेतु

22 मंत्र
भगवान सदाशिव (पंचवक्त्र त्रिनेत्र स्वरूप)

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समंतात्स्थितममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

सभी अज्ञात भयों का शमन, चित्त की मलिनता को दूर कर प्रसन्नता की प्राप्ति, और शिव-तत्व से जुड़कर आध्यात्मिक एकीकरण।

भगवान विष्णु (शान्ताकार स्वरूप)

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिहृद्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

मन से सभी प्रकार के सांसारिक भयों व चिंताओं को नष्ट करना, इष्ट देव के शांत स्वरूप के माध्यम से चित्त में असीम शांति की स्थापना करना।

परब्रह्म (शांति और विद्या स्वरूप)

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

मन में स्थिरता लाना, अंतर्विरोधों को समाप्त कर सामंजस्य स्थापित करना, और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक बाधाओं को शांत करना।

ईश्वर / सार्वभौमिक चेतना (प्रणव)

चित्त को एकाग्र (One-pointed) करना, साधना के सभी विक्षेपों (रोग, आलस्य आदि) का नाश, और चेतना को अंतर्मुखी बनाकर शून्यता में विलीन करना।

भगवान त्र्यम्बक (शिव का मृत्युंजय स्वरूप)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

मृत्युभय, रोग और मानसिक कष्टों का नाश, शारीरिक और मानसिक आरोग्य की पुनः स्थापना, और जीवन-मृत्यु के चक्र से मोक्ष (अमृत पद) की प्राप्ति।

देवी गायत्री / सवितृ (ब्रह्मांडीय ज्योति)

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

अज्ञान के अंधकार को दूर कर प्रज्ञा (Intellect) को जागृत करना, आंतरिक प्रकाश का प्रस्फुटन, प्राण-ऊर्जा की वृद्धि, तथा चेतना का उच्चतर रूपांतरण।

भगवती सरस्वती (ज्ञान और विद्या की देवी)

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अज्ञानता और मानसिक जड़ता को पूर्ण रूप से नष्ट करना, एकाग्रता और स्मरण शक्ति का तीव्र विकास, और अध्ययन में सर्वोच्च ध्यान की प्राप्ति।

श्री हनुमान (स्वर्णिम आभा स्वरूप)

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

असीम मानसिक बल और ज्ञान का आह्वान, अंतर्मन के अज्ञान का शमन, और चित्त में निर्मलता तथा पूर्ण समर्पण लाना।

श्री कृष्ण (गोपाल स्वरूप)

कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्षःस्थले कौस्तुभं नासाग्रे नवमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम्। सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलिं गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपालचूडामणिः॥

मन को सांसारिक विषयों से हटाकर भगवान के आनंदमय स्वरूप में लीन करना, जिससे चित्त में मधुरता, प्रेम और परम शांति का अनुभव हो।

भगवान श्रीराम (धनुर्धारी स्वरूप)

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्। वामाङ्कारूढ सीतामुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचन्द्रम्॥

मन में असीम शांति और निर्भयता लाना, सूक्ष्म शरीर की सुरक्षा की भावना जागृत करना, और इष्टदेव के प्रति पूर्ण शरणागति प्राप्त करना।

भगवान विघ्नेश्वर (गजानन)

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥

ध्यान के मार्ग में आने वाले मानसिक व भौतिक विघ्नों का निवारण, चित्त के शोक का नाश, और साधना की निर्विघ्न पूर्णता।

निराकार परब्रह्म (हंस / सोऽहम्)

सोऽहम्

व्यक्तिगत चेतना (अहं) और सार्वभौमिक चेतना (तत्) के मध्य अद्वैत बोध की प्राप्ति, मन का स्वतः शांत होना, और आत्म-साक्षात्कार।

शुद्ध शिव / चिदानंद (निराकार आत्मतत्त्व)

मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥

शरीर और सांसारिक स्मृतियों के साथ जुड़े मिथ्या तादात्म्य को तोड़ना, अहंकार का नाश करना और मोक्ष की उच्च अवस्था में स्थित होना।

अंतर्मन की विशोक ज्योति (Inner Divine Light)

विशोका वा ज्योतिष्मती

चित्त को शोक और दुःख से मुक्त करना, भावनात्मक लचीलापन विकसित करना, और मन की स्थिति को स्थिर एवं उज्ज्वल बनाना।

परब्रह्म (सत्य और प्रकाश स्वरूप)

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

अवास्तविक (माया) से वास्तविक (सत्य) की ओर प्रस्थान, अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्म-ज्ञान प्राप्त करना, और अमरता की प्रत्यक्ष अनुभूति करना।

माँ दुर्गा (शांत एवं रक्षक स्वरूप)

ॐ जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतलक्षणम्। लोचनत्रयसंयुक्तं पातु मां सर्वतोमुखीम्॥

मन से सभी प्रकार के भयों को दूर करना, ध्यान के दौरान सभी दिशाओं से आध्यात्मिक सुरक्षा का आवरण बनाना, और गहन आंतरिक शांति का अनुभव।

परब्रह्म स्वरूप सद्गुरु

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

साधना में आने वाले अहंकार का नाश, गुरु के दिव्य मार्गदर्शन का आह्वान, तथा ध्यान के लिए आवश्यक मानसिक शुद्धता की प्राप्ति।

सूर्यनारायण / सवितृमंडल

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः। केयूरवान्मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥

आलस्य, प्रमाद और नकारात्मक ऊर्जा का नाश, आरोग्य व तेजस्विता की प्राप्ति, और ध्यान को ज्योतिर्मय तत्त्व पर एकाग्र करना।

श्री हनुमान (रामदूत स्वरूप)

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

मन की चंचलता को नियंत्रित करना, इंद्रियों को वश में करने की शक्ति (जितेंद्रियता) प्राप्त करना, और तुरंत मानसिक शांति प्राप्त करना।

श्री कृष्ण (जगद्गुरु स्वरूप)

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥

परमानंद की अनुभूति, मन के भीतर बैठे अज्ञान रूपी वृत्तियों का नाश, और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए ईश्वर से जुड़ाव।

श्री कृष्ण (नटवर स्वरूप)

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैर्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥

मन के अवसाद और तनाव को समाप्त कर अंतर्मन में अपार उल्लास, जीवंतता और ईश्वरीय प्रेम का संचार करना।

निराकार परब्रह्म (महावाक्य)

अहं ब्रह्मास्मि

अज्ञान और देह-अभिमान को मिटाकर अतिचेतन अवस्था में प्रवेश करना और स्वयं के भीतर छिपी शुद्ध दिव्यता को जाग्रत करना।