ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
बटुक भैरव (आपदुद्धारक) तांत्रिक

बटुक भैरव (आपदुद्धारक) तांत्रिक तांत्रिक मंत्र

ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं

बच्चों की शारीरिक-मानसिक रक्षा, घोर आपत्तियों का उद्धार, अघोर तंत्र बाधा का नाश और मुकदमों में अप्रत्याशित विजय 47।

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

जप काउंटर लोड हो रहा है...

प्रकारतांत्रिक मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

बच्चों की शारीरिक-मानसिक रक्षा, घोर आपत्तियों का उद्धार, अघोर तंत्र बाधा का नाश और मुकदमों में अप्रत्याशित विजय 47।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

बच्चों की शारीरिक-मानसिक रक्षा, घोर आपत्तियों का उद्धार, अघोर तंत्र बाधा का नाश और मुकदमों में अप्रत्याशित विजय

जाप विधि

रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से जप करें। अनुष्ठान पूर्ण होने पर आम की लकड़ी पर लौंग, गुग्गुल, घृत और सुगन्धित पुष्पों से दशांश हवन करें। घर के भीतर आहुति देते समय 'स्वाहा' तथा श्मशान या घर के बाहर 'फट् स्वाहा' का प्रयोग करें 47।

विशेष टिप्पणियाँ

इसे भी पढ़ें

अलग-अलग श्रेणियों से

हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें

vaidik mantra

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥

bhakti mantra

श्री राम जय राम जय जय राम

kaamya mantra

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

mool mantra

दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा

ugra mantra

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं प्रत्यंगिरे सर्वदुष्टान प्राचं छिन्धि छिन्धि

kavach mantra

स्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ 14