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उद्देश्य अनुसार मंत्र
अष्ट भैरव एवं क्षेत्रपाल साधना (भैरव दंड)

अष्ट भैरव एवं क्षेत्रपाल साधना (भैरव दंड) शाबर मंत्र

रक्षपाल आठवा दंड क्षेत्रपाल भैरव हाथ भर खप्पर तेल सिंदूर रक्षपाल येता अष्ट भैरव सदा रहो कृपाल दंड हमारा पिंड का प्राण वज्र हो काया कर रक्षा काली का पूत आवे दंड जावे दंड सो काल भागे 12 कोस काला दंड शीर कंटक का फोड़ हमको रख दुष्ट को पक ऐता भैरव दंड मंत्र संपूर्ण भया श्री नाथ जी गुरु जी को आदेश आदेश सत्य नमो आदेश गुरु जी को आदेश ओम गुरु 10

यह अष्ट भैरव और नाथ परंपरा का एक प्रचंड रक्षात्मक और संहारक अस्त्र (भैरव दंड) है। इसका मुख्य प्रयोजन साधक के 'पिंड' (भौतिक शरीर और प्राण-कोष) को वज्र के समान अभेद्य बनाना और सभी प्रकार के दृश्य एवं अद

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशाबर मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

यह अष्ट भैरव और नाथ परंपरा का एक प्रचंड रक्षात्मक और संहारक अस्त्र (भैरव दंड) है। इसका मुख्य प्रयोजन साधक के 'पिंड' (भौतिक शरीर और प्राण-कोष) को वज्र के समान अभेद्य बनाना और सभी प्रकार के दृश्य एवं अदृश्य दुष्टों, मारण प्रयोगों और ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं को पकड़ कर भस्म करना है 10। इस मंत्र के तीव्र नाद-प्रभाव से अकाल मृत्यु और दुर्घटना (काल) 12 कोस दूर भाग जाते हैं। यह क्षेत्रपाल और अष्ट भैरवों की संयुक्त संहारक ऊर्जा को जाग्रत कर किसी भी प्रकार के तांत्रिक हमलों (शीर कंटक) को बीच मार्ग में ही फोड़ (नष्ट कर) देता है। इसका प्रयोग विशेष रूप से तब किया जाता है जब तंत्र-बाधा से पीड़ित व्यक्ति को संकट-मुक्त करना हो और उस पर भेजे गए 'दंड' (तांत्रिक प्रहार) को वापस उसी तांत्रिक पर पलटना हो 10।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

यह अष्ट भैरव और नाथ परंपरा का एक प्रचंड रक्षात्मक और संहारक अस्त्र (भैरव दंड) है

02

इसका मुख्य प्रयोजन साधक के 'पिंड' (भौतिक शरीर और प्राण-कोष) को वज्र के समान अभेद्य बनाना और सभी प्रकार के दृश्य एवं अदृश्य दुष्टों, मारण प्रयोगों और ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं को पकड़ कर भस्म करना है 10

03

इस मंत्र के तीव्र नाद-प्रभाव से अकाल मृत्यु और दुर्घटना (काल) 12 कोस दूर भाग जाते हैं

04

यह क्षेत्रपाल और अष्ट भैरवों की संयुक्त संहारक ऊर्जा को जाग्रत कर किसी भी प्रकार के तांत्रिक हमलों (शीर कंटक) को बीच मार्ग में ही फोड़ (नष्ट कर) देता है

जाप विधि

इस महा-उग्र मंत्र को सिद्ध करने के लिए अष्ट भैरव और क्षेत्रपाल की विशेष तांत्रिक साधना की जाती है। साधक को शनिवार, मंगलवार या कालभैरव अष्टमी के दिन मध्यरात्रि के समय काले या लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठना चाहिए। सामने कालभैरव या क्षेत्रपाल जी की प्रतिमा अथवा यंत्र स्थापित कर, उन्हें सरसों के तेल और सिंदूर का लेप ('हाथ भर खप्पर तेल सिंदूर') विधिवत अर्पित किया जाता है 10। तदुपरांत सरसों के तेल का एक बड़ा चौमुखी दीपक प्रज्ज्वलित कर रुद्राक्ष या काले हकीक की सिद्ध माला से इस मंत्र का निरंतर और भयमुक्त होकर जप किया जाता है। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, इस जप के दौरान साधक को अपने शरीर (पिंड) को 'वज्र' के समान अभेद्य और कठोर होने की मानसिक भावना (Visualization) करनी होती है 10।

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