नवनाथ एवं गुरु गोरखनाथ रक्षा साधना शाबर मंत्र
भैरव शिव का चेला जहां जहां-जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड काचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा ओम गुरु जी गोरख जति मच्छिंद्र का चेला शिव के रूप में दिखे अलबेला कानों कुंडल गले में नादी हाथ त्रिशूल नाथ है आदि अलख पुरुष को करूं आदेश जन्म जन्म के काटो कलेश भगवा वेश हाथ में खप्पर भैरव शिव का चेला जहां जहां जाऊं नगर डगर लगे वहां फिर मेला शिव का धुना गोरख तापे काल कंटक थर थर कांपे मेरी रक्षा करें नवनाथ रामदूत हनुमंत रिद्धि सिद्धि आंगन विराजे माई अन्नपूर्णा सुखवंत शब्द सांचा पिंड कांचा चलो मंत्र ईश्वर वाचा 2
इस अनुष्ठान का सर्वोपरि प्रयोजन साधक के भौतिक शरीर (पिंड) और उसके आभामंडल के चारों ओर नवनाथों, श्री हनुमान, और भैरव की उग्र शक्तियों द्वारा एक अभेद्य अतीन्द्रिय सुरक्षा घेरा निर्मित करना है 2। नाथ परं
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
इस अनुष्ठान का सर्वोपरि प्रयोजन साधक के भौतिक शरीर (पिंड) और उसके आभामंडल के चारों ओर नवनाथों, श्री हनुमान, और भैरव की उग्र शक्तियों द्वारा एक अभेद्य अतीन्द्रिय सुरक्षा घेरा निर्मित करना है 2। नाथ परंपरा के तांत्रिक परिप्रेक्ष्य में 'काल कंटक' का अर्थ है अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं, तंत्र-प्रहार, और मार्ग में आने वाली घोर बाधाएं। इस मंत्र के नाद से उत्पन्न कंपन से ये सभी कंटक 'थर-थर कांपते' हैं और साधक से कोसों दूर रहते हैं 2। यात्रा के दौरान यह मंत्र साधक को भूत-प्रेत, डाकिनी, और मशान जैसी तामसिक शक्तियों से सुरक्षित रखता है। इसके अतिरिक्त, इस मंत्र में माता अन्नपूर्णा और रिद्धि-सिद्धि का भी आवाहन है, जिसके परिणामस्वरूप यह केवल सुरक्षा ही नहीं देता, अपितु साधक के घर-आंगन में स्थायी समृद्धि, अन्न-धन की पूर्णता और सांसारिक सुखों का भी निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करता है 2।
इस मंत्र से क्या होगा?
इस अनुष्ठान का सर्वोपरि प्रयोजन साधक के भौतिक शरीर (पिंड) और उसके आभामंडल के चारों ओर नवनाथों, श्री हनुमान, और भैरव की उग्र शक्तियों द्वारा एक अभेद्य अतीन्द्रिय सुरक्षा घेरा निर्मित करना है 2
नाथ परंपरा के तांत्रिक परिप्रेक्ष्य में 'काल कंटक' का अर्थ है अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएं, तंत्र-प्रहार, और मार्ग में आने वाली घोर बाधाएं
इस मंत्र के नाद से उत्पन्न कंपन से ये सभी कंटक 'थर-थर कांपते' हैं और साधक से कोसों दूर रहते हैं 2
यात्रा के दौरान यह मंत्र साधक को भूत-प्रेत, डाकिनी, और मशान जैसी तामसिक शक्तियों से सुरक्षित रखता है
जाप विधि
नाथ संप्रदाय के इस आदिम रक्षा मंत्र की सिद्धि किसी अत्यंत शुभ खगोलीय योग (जैसे सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, नवरात्रि, या गुरु पुष्य नक्षत्र) में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करने के पश्चात की जाती है 2। साधक को अपने समक्ष शिव, गुरु गोरखनाथ और नवनाथों का आवाहन करते हुए धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर एक स्थिर आसन पर विराजमान होना होता है। सिद्धि हेतु इस मंत्र का 108 बार (एक पूर्ण माला) रुद्राक्ष पर नियमित जप किया जाता है, जो नाद-ब्रह्म की ऊर्जा को जाग्रत करता है 2। इस मंत्र का व्यावहारिक प्रयोग अत्यंत सूक्ष्म और सटीक है; जब साधक किसी अनजान स्थान, वन, श्मशान, या घोर नकारात्मक ऊर्जा वाले क्षेत्र (नगर या डगर) की ओर प्रस्थान कर रहा हो, तब इस मंत्र का 7 या 11 बार वाचिक अथवा मानसिक जप करके अपने शरीर पर फूंक मारने (न्यास करने) से एक अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा कवच (Aura) जाग्रत हो जाता है 2।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
नीलांचल निवासाय नित्याय परमात्मने। बलभद्र सुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः
tantrik mantraॐ हं सं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः
kavach mantraसकलायुध सम्पूर्ण निखिलाङ्ग सुदर्शन यदम कवच दिव्यम परमानंद दायिनं सौदर्शन यो सदा शुद्ध पठे नरह तस्या सिद्धि विपुला करस्था भवति ध्रुवं कोष्माण्ड चण्ड भूता ये दुष्टा ग्रहा स्मृता पलायन्ते निशंभीता वर्मनोस्य प्रभावतः कुष्ठा पस्मा गुलमा व्याध कर्म हेतुका नश्य तन मंत्रिता भूपाना सप्त दिनावधी अनेन मन्त्रिता मृतानां तुलसी मूल संस्थितां ललाटे तिलकं कृत्वा मोहये त्रिजगन्नरः। 17
beej mantraहं
dhyan mantraॐ जटाजूटसमायुक्तमर्धेन्दुकृतलक्षणम्। लोचनत्रयसंयुक्तं पातु मां सर्वतोमुखीम्॥
mool mantraश्री राम जय राम जय जय राम