अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.३) वैदिक मंत्र
ॐ अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ॥
यज्ञीय कार्यों को निर्विघ्न रूप से पूर्ण करने हेतु अग्नि की मध्यस्थता सुनिश्चित करना एवं संकल्प सिद्धि।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
यज्ञीय कार्यों को निर्विघ्न रूप से पूर्ण करने हेतु अग्नि की मध्यस्थता सुनिश्चित करना एवं संकल्प सिद्धि।
इस मंत्र से क्या होगा?
यज्ञीय कार्यों को निर्विघ्न रूप से पूर्ण करने हेतु अग्नि की मध्यस्थता सुनिश्चित करना एवं संकल्प सिद्धि
जाप विधि
देव-पूजन एवं यज्ञ के आरम्भिक चरण में 'दूत' स्वरूप अग्नि का स्मरण करते हुए स्तुति पाठ एवं गान।
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ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं भुवनेश्वर्यै नमः
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shanti mantraॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः । श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । अवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
kaamya mantraज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम्। आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे॥
naam mantraगोविंद
kavach mantraशम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः। दन्तपङ्क्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम्। कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषवाहनः। वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः। स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मे पातु सन्ततम्। 8