सूर्य नवग्रह मंत्र
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
महर्षि व्यास रचित इस पौराणिक मंत्र का उपयोग जन्मपत्रिका में सूर्य के पापक ग्रहों के साथ होने पर उत्पन्न अंधकार (निराशा) और अज्ञान को दूर करने, पूर्व जन्म के पाप कर्मों के शमन तथा दिन-प्रतिदिन के कार्य
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यह मंत्र क्यों?
महर्षि व्यास रचित इस पौराणिक मंत्र का उपयोग जन्मपत्रिका में सूर्य के पापक ग्रहों के साथ होने पर उत्पन्न अंधकार (निराशा) और अज्ञान को दूर करने, पूर्व जन्म के पाप कर्मों के शमन तथा दिन-प्रतिदिन के कार्यों में आ रही अकारण अड़चनों को समाप्त करने हेतु किया जाता है। 13
इस मंत्र से क्या होगा?
महर्षि व्यास रचित इस पौराणिक मंत्र का उपयोग जन्मपत्रिका में सूर्य के पापक ग्रहों के साथ होने पर उत्पन्न अंधकार (निराशा) और अज्ञान को दूर करने, पूर्व जन्म के पाप कर्मों के शमन तथा दिन-प्रतिदिन के कार्यों में आ रही अकारण अड़चनों को समाप्त करने हेतु किया जाता है
जाप विधि
प्रतिदिन प्रातः काल सूर्य देव को तांबे के पात्र से कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प मिश्रित अर्घ्य (जल) देते समय या उसके तुरंत पश्चात पूर्व मुख होकर खड़े रहकर अथवा बैठकर एक सौ आठ बार इस श्लोक रूपी मंत्र का पाठ करना चाहिए। 12
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ॐ द्रां दत्तात्रेयाय नमः
kavach mantraॐ सौवर्णासन-संस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्। हेमाभांगरुचिं शशांक-मुकुटां सच्चम्पक स्रग्युताम्।। हस्तैर्मुद्गर पाश वज्ररसनाः संबिभ्रतीं भूषणैः। व्याप्तांगीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत्।। शिरो मे पातु ॐ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं पातु ललाटकम्। सम्बोधन-पदं पातु नेत्रे श्रीबगलानने।। श्रुतौ मम रिपुं पातु नासिकां नाशयद्वयम्। पातु गण्डौ सदा मामैश्वर्याण्यन्तं तु मस्तकम्।। देहि द्वन्द्वं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम। कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं बाहुमूलकम्।। कार्यं साधयद्वन्द्वं तु करौ पातु सदा मम। मायायुक्ता तथा स्वाहा हृदयं पातु सर्वदा।। अष्टाधिक चत्वारिंश दण्डाढया बगलामुखी। रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेऽरण्ये सदा मम।। ब्रह्मास्त्राख्यो मनुः पातु सर्वांगे सर्व सन्धिषु। मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा।। ॐ ह्रीं पातु नाभिदेशं कटिं मे बगलाऽवतु। मुखिवर्णद्वयं पातु लिंग मे मुष्क-युग्मकम्।। जानुनी सर्वदुष्टानां पातु मे वर्णपञ्चकम्। वाचं मुखं तथा पादं षड्वर्णाः परमेश्वरी।। जंघायुग्मे सदा पातु बगला रिपुमोहिनी। स्तम्भयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम।। जिह्वा वर्णद्वयं पातु गुल्फौ मे कीलयेति च। पादोर्ध्व सर्वदा पातु बुद्धिं पादतले मम।। विनाशय पदं पातु पादांगुल्योर्नखानि मे। ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धिन्द्रियवचांसि मे।। सर्वांगं प्रणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेऽवतु। ब्राह्मी पूर्वदले पातु चाग्नेय्यां विष्णुवल्लभा।। माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेऽवतु। कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता।। वाराही चोत्तरे पातु नारसिंही शिवेऽवतु। ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदाऽवतु।। इत्यष्टौ शक्तयः पान्तु सायुधाश्च सवाहनाः। राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः।। श्मशाने जलमध्ये च भैरवश्च सदाऽवतु। द्विभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः।। योगिन्यः सर्वदा पान्तु महारण्ये सदा मम। इति ते कथितं देवि कवचं परमाद् भुतम्।। 13
beej mantraश्रीं
ugra mantraॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा
dhyan mantraमनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
stotra mantraयोगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः। नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥ 12