भगवान श्री हरि (विष्णु) भक्ति मंत्र
अच्युताय नमः, अनन्ताय नमः, गोविन्दाय नमः
भगवान के कभी न नष्ट होने वाले (अच्युत), सीमारहित (अनंत) और इंद्रियों के स्वामी (गोविंद) स्वरूप की वंदना कर, समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों, मानसिक कष्टों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति प्राप्त करना इस
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
भगवान के कभी न नष्ट होने वाले (अच्युत), सीमारहित (अनंत) और इंद्रियों के स्वामी (गोविंद) स्वरूप की वंदना कर, समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों, मानसिक कष्टों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति प्राप्त करना इस जप का मुख्य उद्देश्य है 10। यह नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर सर्वांगीण आरोग्य और ईश्वर के प्रति शरणागति प्रदान करता है 10।
इस मंत्र से क्या होगा?
भगवान के कभी न नष्ट होने वाले (अच्युत), सीमारहित (अनंत) और इंद्रियों के स्वामी (गोविंद) स्वरूप की वंदना कर, समस्त प्रकार के शारीरिक रोगों, मानसिक कष्टों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति प्राप्त करना इस जप का मुख्य उद्देश्य है 10
यह नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर सर्वांगीण आरोग्य और ईश्वर के प्रति शरणागति प्रदान करता है
जाप विधि
इस त्रयी नाम-मंत्र का जप किसी भी समय, शुद्ध अवस्था में एकांत में बैठकर मानसिक या वाचिक रूप से किया जा सकता है 10। इस मंत्र को 'अथर्व मंत्र विधि' के अंतर्गत भी जपा जाता है, जिसमें गंगाजल या तुलसी पत्र को सम्मुख रखकर इस मंत्र से अभिमंत्रित कर उसे औषधि रूप में ग्रहण किया जाता है 12। इसमें किसी विशेष कर्मकांड या कठिन आसन की आवश्यकता नहीं है, केवल भगवान के इन तीन स्वरूपों का दृढ़ विश्वास के साथ निरंतर स्मरण करना होता है 11।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ स्वाहा
kavach mantraॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥ अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्। देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥ प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥ शाकिनी तथा अंतरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाय प्रभु तपिश न धीर वृषभ वृषभ लो कुष्मांडा ब्रॉदर यह नश्यंति दर्शनात्तस्य कवचे 9
beej mantraब्रां
ugra mantraॐ पक्षिराजाय विद्महे शरभेश्वराय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
dhyan mantraअहं ब्रह्मास्मि
stotra mantraविष्णु-स्तुतिपरां लक्ष्मीं स्वर्णवर्णां स्तुति-प्रियाम् । वरदाभयदां देवीं वन्दे त्वां कमलेक्षणे ॥ 27