परमात्मा (वागाम्भृणी) / वाक् सूक्त (१०.१२५.५) वैदिक मंत्र
ॐ अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः । यं कामये तंतमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ॥
वाक्-सिद्धि, सर्वोच्च ज्ञान एवं मेधा की प्राप्ति, विद्वता में वृद्धि एवं ईश्वरीय कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव।
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यह मंत्र क्यों?
वाक्-सिद्धि, सर्वोच्च ज्ञान एवं मेधा की प्राप्ति, विद्वता में वृद्धि एवं ईश्वरीय कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव।
इस मंत्र से क्या होगा?
वाक्-सिद्धि, सर्वोच्च ज्ञान एवं मेधा की प्राप्ति, विद्वता में वृद्धि एवं ईश्वरीय कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव
जाप विधि
विद्यारम्भ, बौद्धिक कार्यों के आरम्भ में अथवा वाक्-सिद्धि अनुष्ठान में सुखासन में बैठकर उपांशु जप।
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शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥
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jap mantraॐ
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