भगवान सूर्य (त्रैलोक्य मंगल सूर्य कवच) कवच मंत्र
पातु श्रवणे वासरेश्वर घ्राणं धर्म पातु पदन वेदवाहन जीवा मानद पातु कंठ में सुरवंदित स्कंद प्रभाकर पातु वक्ष पातु जन प्रिय पातु पाद द्वादशात्मा सर्व सर्वांग सकलेश्वर यक्ष गन्धर्व राक्षसाः ब्रह्मराक्षस वेतालाः क्षमा दूरा देव पलायंते तस्य संकीर्तना अज्ञात कवच दिव्य यो जपे सूर्य मंत्रम् सिद्धि जायते तस्य कल्पकोटि शतैरपि। इति श्री ब्रह्मयामले त्रैलोक्य मंगलम नाम सूर्य कवचम संपूर्णम। 15
यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस और वेताल आदि के भय का पलायन, घोर रोगों से मुक्ति, असीम सुख, शारीरिक पुष्टि, दीर्घायु की प्राप्ति और कल्पकोटि तक सर्वसिद्धि की प्राप्ति 15।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस और वेताल आदि के भय का पलायन, घोर रोगों से मुक्ति, असीम सुख, शारीरिक पुष्टि, दीर्घायु की प्राप्ति और कल्पकोटि तक सर्वसिद्धि की प्राप्ति 15।
इस मंत्र से क्या होगा?
यक्ष, गंधर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस और वेताल आदि के भय का पलायन, घोर रोगों से मुक्ति, असीम सुख, शारीरिक पुष्टि, दीर्घायु की प्राप्ति और कल्पकोटि तक सर्वसिद्धि की प्राप्ति
जाप विधि
स्वस्थ मन से और सुस्नात होकर नित्य इस कवच का जप करें। रविवार के दिन, संक्रान्ति या सप्तमी तिथि पर इसे गोरोचन और कुमकुम से भूर्जपत्र पर लिखें तथा त्रिलोह (तीन धातुओं) के मध्य रखकर दाहिने हाथ की शिखा अथवा कण्ठ में धारण करें 15।
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