भगवान विष्णु / सुदर्शन चक्र (सुदर्शन कवच) कवच मंत्र
सकलायुध सम्पूर्ण निखिलाङ्ग सुदर्शन यदम कवच दिव्यम परमानंद दायिनं सौदर्शन यो सदा शुद्ध पठे नरह तस्या सिद्धि विपुला करस्था भवति ध्रुवं कोष्माण्ड चण्ड भूता ये दुष्टा ग्रहा स्मृता पलायन्ते निशंभीता वर्मनोस्य प्रभावतः कुष्ठा पस्मा गुलमा व्याध कर्म हेतुका नश्य तन मंत्रिता भूपाना सप्त दिनावधी अनेन मन्त्रिता मृतानां तुलसी मूल संस्थितां ललाटे तिलकं कृत्वा मोहये त्रिजगन्नरः। 17
दुष्ट ग्रहों, कुष्मांड, चण्ड, भूत और पिशाचों का भय नाश, कुष्ठ और अपस्मार जैसी गंभीर व्याधियों की सात दिनों में निवृत्ति, और त्रिलोक को सम्मोहित करने की विशिष्ट शक्ति की प्राप्ति 18।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
दुष्ट ग्रहों, कुष्मांड, चण्ड, भूत और पिशाचों का भय नाश, कुष्ठ और अपस्मार जैसी गंभीर व्याधियों की सात दिनों में निवृत्ति, और त्रिलोक को सम्मोहित करने की विशिष्ट शक्ति की प्राप्ति 18।
इस मंत्र से क्या होगा?
दुष्ट ग्रहों, कुष्मांड, चण्ड, भूत और पिशाचों का भय नाश, कुष्ठ और अपस्मार जैसी गंभीर व्याधियों की सात दिनों में निवृत्ति, और त्रिलोक को सम्मोहित करने की विशिष्ट शक्ति की प्राप्ति
जाप विधि
दाहिने हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़ें और जल भूमि पर छोड़ दें। तदुपरांत शुद्ध शरीर और मन से नित्य इस दिव्य कवच का पाठ करें। मंत्रित जल या भस्म का प्रयोग रोगों के निवारण हेतु किया जा सकता है 18।
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