ॐ नमः शिवाय  |  जय श्री राम  |  हरे कृष्ण
उद्देश्य अनुसार मंत्र
महादेवी एवं गुरु गोरखनाथ सर्वकार्य सिद्धि

महादेवी एवं गुरु गोरखनाथ सर्वकार्य सिद्धि शाबर मंत्र

ओम नमो महादेवी सर्व कार्य सिद्धि करनी जो पाती पूरे ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों देवन मेरी भक्ति गुरु की शक्ति श्री गुरु गोरखनाथ की दुहाई फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा 3

इस शाबर प्रयोग का मुख्य प्रयोजन उन असाध्य, अत्यंत जटिल भौतिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक कार्यों की त्वरित सिद्धि है, जो सामान्य मानवीय प्रयासों और वैदिक अनुष्ठानों से पूर्ण नहीं हो रहे हों 3। इस मंत्र के

साधना मंडल

जप, संकल्प और उपासना संकेत

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प्रकारशाबर मंत्र
प्रयोजन

यह मंत्र क्यों?

इस शाबर प्रयोग का मुख्य प्रयोजन उन असाध्य, अत्यंत जटिल भौतिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक कार्यों की त्वरित सिद्धि है, जो सामान्य मानवीय प्रयासों और वैदिक अनुष्ठानों से पूर्ण नहीं हो रहे हों 3। इस मंत्र के माध्यम से ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिदेवों की ब्रह्मांडीय निर्माण, पालन और संहारक ऊर्जाओं को एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है और गुरु गोरखनाथ की अमोघ दुहाई लगाकर उन शक्तियों को साधक की गुप्त मनोकामना पूर्ति हेतु निर्देशित किया जाता है 3। जब तक कार्य सिद्ध न हो जाए, तब तक यह मंत्र-ऊर्जा सूक्ष्म रूप से ब्रह्मांड में अनवरत कार्य करती रहती है। मनोकामना पूर्ण होने के उपरांत साधक द्वारा गुरु गोरखनाथ को मानसिक धन्यवाद ज्ञापित करना इस तांत्रिक चक्र को पूर्ण और संतुलित करता है 3।

लाभ एक दृष्टि में

इस मंत्र से क्या होगा?

01

इस शाबर प्रयोग का मुख्य प्रयोजन उन असाध्य, अत्यंत जटिल भौतिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक कार्यों की त्वरित सिद्धि है, जो सामान्य मानवीय प्रयासों और वैदिक अनुष्ठानों से पूर्ण नहीं हो रहे हों 3

02

इस मंत्र के माध्यम से ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे त्रिदेवों की ब्रह्मांडीय निर्माण, पालन और संहारक ऊर्जाओं को एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है और गुरु गोरखनाथ की अमोघ दुहाई लगाकर उन शक्तियों को साधक की गुप्त मनोकामना पूर्ति हेतु निर्देशित किया जाता है 3

03

जब तक कार्य सिद्ध न हो जाए, तब तक यह मंत्र-ऊर्जा सूक्ष्म रूप से ब्रह्मांड में अनवरत कार्य करती रहती है

04

मनोकामना पूर्ण होने के उपरांत साधक द्वारा गुरु गोरखनाथ को मानसिक धन्यवाद ज्ञापित करना इस तांत्रिक चक्र को पूर्ण और संतुलित करता है

जाप विधि

यह गुरु गोरखनाथ परंपरा का एक अत्यंत विशिष्ट, समय-बद्ध और गुप्त शाबर अनुष्ठान है, जिसे मुख्य रूप से मकर संक्रांति या किसी अत्यंत शुभ तांत्रिक पर्व के आस-पास ही संपन्न किया जाता है 3। साधक को मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व (अर्थात 14 जनवरी या तदनुरूप तिथि को) एकांत में बैठकर इस मंत्र की 31 माला का जप पूर्ण करना होता है 3। यदि एक दिन में 31 माला का जप संभव न प्रतीत हो, तो साधक इसे एक दिन पूर्व (शनिवार आदि) प्रारंभ कर सकता है और अधिकांश मालाओं का जप उसी दिन पूर्ण कर संक्रांति की रात्रि तक शेष जप पूर्ण कर सकता है 3। अनुष्ठान की सबसे कठोर शर्त यह है कि जप के दौरान और उसके पश्चात साधक को अपनी अभीष्ट मनोकामना पूर्णतः अपने मन में गुप्त रखनी होती है; इसका मौखिक उच्चारण या किसी अन्य व्यक्ति से साझा करना ऊर्जा के प्रवाह को भंग कर अनुष्ठान को खंडित कर सकता है 3। अनुष्ठान की पूर्णता (उद्यापन) के रूप में संक्रांति के अगले दिन प्रातः काल स्नान के पश्चात तिल से बनी सामग्रियों, गुड़, और कुछ धनराशि को अत्यंत गरीब और निशक्त जनों में गुप्त रूप से दान करना अनिवार्य है 3।

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ॐ सौवर्णासन-संस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्। हेमाभांगरुचिं शशांक-मुकुटां सच्चम्पक स्रग्युताम्।। हस्तैर्मुद्गर पाश वज्ररसनाः संबिभ्रतीं भूषणैः। व्याप्तांगीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत्।। शिरो मे पातु ॐ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं पातु ललाटकम्। सम्बोधन-पदं पातु नेत्रे श्रीबगलानने।। श्रुतौ मम रिपुं पातु नासिकां नाशयद्वयम्। पातु गण्डौ सदा मामैश्वर्याण्यन्तं तु मस्तकम्।। देहि द्वन्द्वं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम। कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं बाहुमूलकम्।। कार्यं साधयद्वन्द्वं तु करौ पातु सदा मम। मायायुक्ता तथा स्वाहा हृदयं पातु सर्वदा।। अष्टाधिक चत्वारिंश दण्डाढया बगलामुखी। रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेऽरण्ये सदा मम।। ब्रह्मास्त्राख्यो मनुः पातु सर्वांगे सर्व सन्धिषु। मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा।। ॐ ह्रीं पातु नाभिदेशं कटिं मे बगलाऽवतु। मुखिवर्णद्वयं पातु लिंग मे मुष्क-युग्मकम्।। जानुनी सर्वदुष्टानां पातु मे वर्णपञ्चकम्। वाचं मुखं तथा पादं षड्वर्णाः परमेश्वरी।। जंघायुग्मे सदा पातु बगला रिपुमोहिनी। स्तम्भयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम।। जिह्वा वर्णद्वयं पातु गुल्फौ मे कीलयेति च। पादोर्ध्व सर्वदा पातु बुद्धिं पादतले मम।। विनाशय पदं पातु पादांगुल्योर्नखानि मे। ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धिन्द्रियवचांसि मे।। सर्वांगं प्रणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेऽवतु। ब्राह्मी पूर्वदले पातु चाग्नेय्यां विष्णुवल्लभा।। माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेऽवतु। कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता।। वाराही चोत्तरे पातु नारसिंही शिवेऽवतु। ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदाऽवतु।। इत्यष्टौ शक्तयः पान्तु सायुधाश्च सवाहनाः। राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः।। श्मशाने जलमध्ये च भैरवश्च सदाऽवतु। द्विभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः।। योगिन्यः सर्वदा पान्तु महारण्ये सदा मम। इति ते कथितं देवि कवचं परमाद् भुतम्।। 13

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