भगवान विष्णु / गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र स्तोत्र मंत्र
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु । तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥ 4
कलियुग के समस्त पापों का नाश, दुःस्वप्न निवारण, जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति और श्रेय की प्राप्ति 4।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
कलियुग के समस्त पापों का नाश, दुःस्वप्न निवारण, जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति और श्रेय की प्राप्ति 4।
इस मंत्र से क्या होगा?
कलियुग के समस्त पापों का नाश, दुःस्वप्न निवारण, जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति और श्रेय की प्राप्ति
जाप विधि
हृदय में बुद्धि और ध्यान को एकाग्र करके इस स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करें 4।
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ॐ ऐं क्लीं सौः
kavach mantraॐ सौवर्णासन-संस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लासिनीम्। हेमाभांगरुचिं शशांक-मुकुटां सच्चम्पक स्रग्युताम्।। हस्तैर्मुद्गर पाश वज्ररसनाः संबिभ्रतीं भूषणैः। व्याप्तांगीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तयेत्।। शिरो मे पातु ॐ ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं पातु ललाटकम्। सम्बोधन-पदं पातु नेत्रे श्रीबगलानने।। श्रुतौ मम रिपुं पातु नासिकां नाशयद्वयम्। पातु गण्डौ सदा मामैश्वर्याण्यन्तं तु मस्तकम्।। देहि द्वन्द्वं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम। कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं बाहुमूलकम्।। कार्यं साधयद्वन्द्वं तु करौ पातु सदा मम। मायायुक्ता तथा स्वाहा हृदयं पातु सर्वदा।। अष्टाधिक चत्वारिंश दण्डाढया बगलामुखी। रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेऽरण्ये सदा मम।। ब्रह्मास्त्राख्यो मनुः पातु सर्वांगे सर्व सन्धिषु। मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा।। ॐ ह्रीं पातु नाभिदेशं कटिं मे बगलाऽवतु। मुखिवर्णद्वयं पातु लिंग मे मुष्क-युग्मकम्।। जानुनी सर्वदुष्टानां पातु मे वर्णपञ्चकम्। वाचं मुखं तथा पादं षड्वर्णाः परमेश्वरी।। जंघायुग्मे सदा पातु बगला रिपुमोहिनी। स्तम्भयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम।। जिह्वा वर्णद्वयं पातु गुल्फौ मे कीलयेति च। पादोर्ध्व सर्वदा पातु बुद्धिं पादतले मम।। विनाशय पदं पातु पादांगुल्योर्नखानि मे। ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धिन्द्रियवचांसि मे।। सर्वांगं प्रणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेऽवतु। ब्राह्मी पूर्वदले पातु चाग्नेय्यां विष्णुवल्लभा।। माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेऽवतु। कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता।। वाराही चोत्तरे पातु नारसिंही शिवेऽवतु। ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदाऽवतु।। इत्यष्टौ शक्तयः पान्तु सायुधाश्च सवाहनाः। राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः।। श्मशाने जलमध्ये च भैरवश्च सदाऽवतु। द्विभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः।। योगिन्यः सर्वदा पान्तु महारण्ये सदा मम। इति ते कथितं देवि कवचं परमाद् भुतम्।। 13
beej mantraक्रां
ugra mantraॐ ऐं ह्रीं क्लीं प्रत्यंगिरे सर्वदुष्टान प्राचं छिन्धि छिन्धि
dhyan mantraमनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
vaidik mantraॐ यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥