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क्या है

कर्मफल क्या है?(9)

कर्मफल का अर्थकर्मफल क्या है?कर्मफल का महत्व
सरल उत्तर

कर्म = विचार + वाणी + कर्म। कोई कर्म नष्ट नहीं होता। तीन प्रकार: संचित (पुराने कर्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग/भाग्य), आगामी (वर्तमान कर्म — भविष्य बदलते हैं)। निष्काम कर्म = मुक्ति। ज्ञान से कर्म नष्ट होते हैं (गीता 4.37)।

स्रोत प्रश्न: कर्म सिद्धांत क्या है? →
सनातन सिद्धांत

कर्म सिद्धांत क्या है?

कर्म = विचार + वाणी + कर्म। कोई कर्म नष्ट नहीं होता। तीन प्रकार: संचित (पुराने कर्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग/भाग्य), आगामी (वर्तमान कर्म — भविष्य बदलते हैं)। निष्काम कर्म = मुक्ति। ज्ञान से कर्म नष्ट होते हैं (गीता 4.37)।

#कर्म#कर्मफल#संचित कर्म
श्रीमद्भागवत

लोभ और वासना का अंत क्या होता है?

धुंधुकारी वासना और लोभ में अंधा होकर चोरी में लगा और अंत में जिनके लिये धन लाया उन्हीं के हाथ मारा गया।

#लोभ#वासना#कुसंग
श्रीमद्भागवत

कुसंग का परिणाम क्या होता है?

कुसंग से धुंधुकारी की बुद्धि नष्ट हुई, उसने चोरी और क्रूर कर्म किए और अंत में उसी संगति ने उसकी हत्या कर दी।

#कुसंग#लोभ#धुंधुकारी
श्रीमद्भागवत

बुरे कर्मों का फल मृत्यु के बाद क्या होता है?

धुंधुकारी के उदाहरण में बुरे कर्मों का फल मृत्यु के बाद प्रेत योनि, भूख-प्यास, भटकाव और असहायता के रूप में आया।

#बुरे कर्म#कर्मफल#मृत्यु
नवग्रह परिचय

नवग्रह क्या हैं?

नवग्रह केवल खगोलीय पिंड नहीं — परमपिता ब्रह्मा द्वारा नियुक्त वे दिव्य शक्तियाँ हैं जो मनुष्य के कर्मों का फल देती हैं और ब्रह्मांडीय न्याय के प्रशासक हैं।

#नवग्रह#ब्रह्मांडीय प्रशासक#कर्मफल
जीवन एवं मृत्यु

धर्मराज का कार्य क्या है?

धर्मराज यमदूत भेजते हैं, चित्रगुप्त के लेखे से कर्म-न्याय करते हैं और जीव को स्वर्ग-नरक-पुनर्जन्म का निर्णय देते हैं। उनका न्याय पूर्णतः निष्पक्ष और अटल है। यमलोक की समस्त व्यवस्था उनके अधीन है।

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भक्ति एवं आध्यात्म

पुनर्जन्म का सिद्धांत क्या है?

पुनर्जन्म का अर्थ है — मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर धारण करती है। गीता में श्रीकृष्ण ने इसे स्वीकार किया है। कर्म-बंधन मिटने पर ही यह चक्र रुकता है।

#पुनर्जन्म#जन्म-मरण चक्र#कर्मफल
भक्ति एवं आध्यात्म

कर्म सिद्धांत क्या है सरल भाषा में?

शरीर, वाणी और मन से की गई प्रत्येक क्रिया कर्म है। शुभ कर्म सुख देते हैं, अशुभ दुख। गीता का उपदेश है — फल की आसक्ति छोड़कर निष्काम भाव से कर्म करो।

#कर्म सिद्धांत#कर्मफल#गीता
शास्त्र ज्ञान

उपनिषद में कर्म का सिद्धांत क्या है?

बृहदारण्यक (4/4/5) — 'जैसा कर्म, जैसा आचरण — वैसा ही बनता है।' छान्दोग्य (5/10/7) में देवयान और पितृयान — दो कर्म-मार्ग बताए गए हैं। ईशावास्योपनिषद (1-2) में निर्लेप कर्म का संदेश है। ब्रह्मज्ञान से सभी कर्म-बंधन नष्ट होते हैं।

#कर्म#उपनिषद#कर्मफल
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