विस्तृत उत्तर
पुनर्जन्म सनातन दर्शन का वह सिद्धांत है जो बताता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं होता, बल्कि वह अपने कर्मों के अनुसार नया शरीर धारण करती है।
शास्त्रीय आधार — वेद, उपनिषद, गीता और पुराण सभी में इस सिद्धांत का प्रतिपादन है। भगवद्गीता (2.22) में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जीवात्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है — ठीक वैसे जैसे व्यक्ति पुराने वस्त्र बदलता है। गीता (4.5) में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि उन्हें अपने पिछले अनेक जन्म स्मरण हैं।
पुनर्जन्म का आधार — कर्म और वासना है। इस जन्म में जो कर्म किए और जो इच्छाएँ अतृप्त रहीं, वे संस्कार सूक्ष्म शरीर के साथ बनी रहती हैं। मृत्यु के बाद जीवात्मा इन्हीं कर्म-संस्कारों के अनुसार अगले जन्म में उचित योनि, परिवार और परिस्थिति प्राप्त करती है। शास्त्रों में 84 लाख योनियों का उल्लेख है जिनमें जीव भ्रमण करता है।
पुनर्जन्म से मुक्ति — जब जीव का समस्त कर्म-बंधन और वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, तब पुनर्जन्म का चक्र रुकता है — यही मोक्ष है।
आधुनिक युग में भी डॉ. इयान स्टीवेन्सन जैसे शोधकर्ताओं ने पूर्वजन्म की स्मृतियों के हजारों मामलों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया है।





