कर्म = विचार + वाणी + कर्म। कोई कर्म नष्ट नहीं होता। तीन प्रकार: संचित (पुराने कर्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग/भाग्य), आगामी (वर्तमान कर्म — भविष्य बदलते हैं)। निष्काम कर्म = मुक्ति। ज्ञान से कर्म नष्ट होते हैं (गीता 4.37)।
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