विस्तृत उत्तर
श्रीमद्भागवत पुराण के एकादश स्कन्ध (११.१७.३१) में भगवान श्रीकृष्ण उद्धव जी को वर्णाश्रम धर्म का उपदेश देते हुए स्पष्ट करते हैं कि वे विद्यार्थी (ब्रह्मचारी) जो जीवन भर पूर्ण रूप से अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वेदों का अत्यंत गहन अध्ययन करते हैं और बिना किसी सांसारिक इच्छा के अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहते हैं, वे मृत्यु के पश्चात् सीधे महर्लोक को प्राप्त करते हैं। अखंड ब्रह्मचर्य से इन्द्रियों की शक्ति संरक्षित रहती है और यही शक्ति आत्मा को ऊर्ध्व लोकों तक ले जाती है। वेदाध्ययन और गुरु-सेवा से ज्ञान की उच्चतम भूमि प्राप्त होती है। इन तीनों के संयोग से साधक महर्लोक का अधिकारी बन जाता है।
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