विस्तृत उत्तर
तंजावुर (तमिलनाडु) स्थित बृहदेश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) चोल राजा राजराज प्रथम द्वारा 1010 ई. में निर्मित है। यह UNESCO विश्व धरोहर स्थल है।
'छाया नहीं पड़ती' — दावा
एक प्रचलित मान्यता है कि इस मंदिर के विमान (शिखर/गोपुरम) की छाया दोपहर के समय जमीन पर नहीं पड़ती।
वास्तविकता और विश्लेषण
1यह दावा पूर्णतः सटीक नहीं है
वास्तव में मंदिर के विमान (216 फीट/66 मीटर ऊँचा) की छाया दोपहर 12 बजे के आसपास मंदिर के आधार (Base) के भीतर ही पड़ती है — बाहर की जमीन पर नहीं पड़ती। यह मंदिर की वास्तु-योजना का एक अद्भुत उदाहरण है।
2वैज्ञानिक कारण
- ▸मंदिर 10°N अक्षांश पर स्थित है — यहाँ सूर्य वर्ष में दो बार (अप्रैल-मई और अगस्त) ठीक सिर पर आता है
- ▸विमान का आकार ऊपर की ओर संकरा होता जाता है (पिरामिडनुमा) — इससे छाया का क्षेत्र कम
- ▸मंदिर का आधार (प्रांगण) इतना विशाल है कि दोपहर की छोटी छाया आधार के भीतर ही समा जाती है
- ▸यह प्रभाव मुख्यतः दोपहर में (जब सूर्य सर्वोच्च) दिखता है — सुबह-शाम छाया बाहर भी पड़ती है
3वास्तुशिल्प की अद्भुतता
- ▸विमान का शीर्ष 80 टन का एकल ग्रेनाइट पत्थर (कपोल) — इसे 216 फीट ऊँचाई पर कैसे रखा गया, यह रहस्य है
- ▸एक सिद्धांत: 6 किमी लम्बा ढलान (ramp) बनाकर पत्थर ऊपर ले जाया गया
- ▸130,000 टन ग्रेनाइट का उपयोग — बिना सीमेंट, केवल इंटरलॉकिंग तकनीक
- ▸नींव में कोई पत्थर नहीं मिला — कुछ विद्वान इसे 'तैरती नींव' (Floating Foundation) कहते हैं
4अन्य अद्भुत तथ्य
- ▸मंदिर का विमान एक ही ग्रेनाइट चट्टान पर उत्कीर्ण
- ▸दीवारों पर चोल कालीन चित्रकला (भित्तिचित्र) आज भी सुरक्षित
- ▸1000+ वर्ष बाद भी संरचना अक्षत
सारांश
यह दावा कि 'छाया बिल्कुल नहीं पड़ती' अतिशयोक्ति है, परंतु दोपहर में छाया का मंदिर आधार के भीतर ही रहना — चोल वास्तुकारों की अद्भुत गणितीय और खगोलीय समझ का प्रमाण है।





