विस्तृत उत्तर
हाटक स्वर्ण वितल लोक में उत्पन्न होने वाला अत्यंत देदीप्यमान, दिव्य और अलौकिक स्वर्ण है। यह पृथ्वी पर खदानों से प्राप्त साधारण सोने से सर्वथा भिन्न है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हाटकी नदी के तेज को अग्निदेव पान करते हैं, पर शिव और शक्ति का वह तेज इतना प्रखर और अनंत होता है कि अग्निदेव भी उसे पचा नहीं पाते। तब अग्निदेव उस तेज को 'सि-सि' ध्वनि करते हुए बाहर उगल देते हैं। अग्निदेव द्वारा उगला गया वही शिव-शक्ति का घनीभूत तेज हाटक नामक स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। वितल लोक में असुर राजा और उनकी पत्नियाँ इसी हाटक स्वर्ण से बने आभूषण धारण करते हैं।
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