विस्तृत उत्तर
ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहम संस्कृत के दो वाक्य हैं जिनका अर्थ है — मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही सिद्ध हूँ। श्रीमद्भागवत महापुराण (5.24.16) में वर्णित है कि जब कोई पुरुष अतल लोक में प्रविष्ट होकर हाटक रस पी लेता है तो उसके भीतर इतना प्रबल मिथ्या अहंकार जाग्रत हो जाता है कि वह गर्व से इसी उद्घोष को करता रहता है — ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहम। उसे ऐसा भ्रम हो जाता है मानो उसके भीतर दस हजार विशाल हाथियों का बल आ गया हो। यह प्रसंग दर्शाता है कि अतल लोक में अत्यधिक भौतिक भोग और मादकता किस प्रकार जीव के विवेक और आध्यात्मिक ज्ञान को नष्ट कर उसे अहंकार के अंधकूप में धकेल देती है जहाँ वह अपनी सीमित सत्ता को ही सर्वशक्तिमान ईश्वर मान बैठता है।
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