विस्तृत उत्तर
महर्लोक के संदर्भ में यज्ञ से तात्पर्य भौतिक अग्नि में घृत या समिधा की आहुति देने से नहीं है। यहाँ ज्ञान यज्ञ और तपो यज्ञ की प्रधानता है। ज्ञान यज्ञ में ऋषिगण अपने सूक्ष्म अहंकार, अज्ञान और चित्त-वृत्तियों की आहुति परम सत्य (ब्रह्म) की अग्नि में देते हैं। इस ज्ञान यज्ञ में साधक अपने भीतर के अहंकार, मिथ्या पहचान और अज्ञान को ब्रह्म-ज्ञान की अग्नि में जला देता है। यह आत्म-शुद्धि की सर्वोच्च प्रक्रिया है जो भौतिक यज्ञों से अत्यंत उच्च कोटि की है। इस ज्ञान यज्ञ का फल स्वर्ग जैसे भौतिक भोग नहीं बल्कि परब्रह्म का प्रत्यक्ष दर्शन और ब्रह्माण्ड की उच्चतम आध्यात्मिक भूमि (जनलोक, सत्यलोक) तक की यात्रा है। महर्लोक के महर्षि निरंतर यज्ञेश्वर भगवान की मानसिक और आध्यात्मिक आराधना में लीन रहते हैं।
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