विस्तृत उत्तर
पिंडदान पितरों (मृत पूर्वजों) की तृप्ति और मुक्ति के लिए किया जाने वाला अत्यन्त महत्वपूर्ण कर्म है।
सामान्य मंदिर में पिंडदान
जैसा पूर्व बैच (1031) में बताया — सामान्य मंदिर के गर्भगृह में पिंडदान अनुशंसित नहीं। परंतु कुछ विशिष्ट तीर्थ-मंदिरों में यह शास्त्रसम्मत है।
विशिष्ट पिंडदान तीर्थ-मंदिर
1गया (बिहार) — सर्वोच्च
विष्णुपद मंदिर = पिंडदान का सर्वश्रेष्ठ स्थान। गयासुर की कथा — भगवान विष्णु ने गयासुर के शरीर पर पैर रखा, वहाँ विष्णुपद। गया में 45+ पिंडदान स्थल (वेदियाँ)।
2प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)
गंगा-यमुना-सरस्वती संगम = पिंडदान अत्यन्त शुभ।
3काशी (वाराणसी)
मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट = श्राद्ध/पिंडदान।
4रामेश्वरम
सेतुबंध — पिंडदान का दक्षिणी तीर्थ।
5. अन्य: हरिद्वार, त्र्यम्बकेश्वर (नारायण नागबलि), बद्रीनाथ
पिंडदान विधि (संक्षिप्त)
5पिंड सामग्री
- ▸चावल/जौ का आटा + तिल + शहद + घी + दूध = पिंड (गोले) बनाना
- ▸सामान्यतः 3 या 7 पिंड (पिता, दादा, परदादा + अन्य)
6तर्पण (जल अर्पण)
- ▸पवित्र जल + तिल + कुश (दर्भ)
- ▸दक्षिण दिशा मुख करके
- ▸सव्य → अपसव्य (यज्ञोपवीत दाएँ कन्धे पर)
7पिंड अर्पण
- ▸कुश (दर्भ) पर पिंड रखना
- ▸मंत्रों के साथ पितरों को आवाहन
- ▸पिंड पर तिल + जल छिड़कना
8ब्राह्मण भोजन + दक्षिणा
- ▸पिंडदान के बाद ब्राह्मण भोजन अनिवार्य
- ▸ब्राह्मण = पितरों का प्रतिनिधि
कब करें
- ▸पितृपक्ष (भाद्रपद कृष्ण — 15 दिन) — सर्वोत्तम
- ▸मृत्यु तिथि (वार्षिक श्राद्ध)
- ▸अमावस्या
- ▸ग्रहण काल
कौन करे
- ▸ज्येष्ठ पुत्र (प्राथमिक)
- ▸पुत्र न हो — पुत्री का पति, भतीजा, या कोई भी परिजन
गरुड पुराण
गयायां पिंडदानेन पितॄणां मुक्तिरुत्तमा।' — गया में पिंडदान से पितरों को उत्तम मुक्ति।





