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मंदिर संस्कार📜 गरुड पुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, श्राद्ध विधि, गया माहात्म्य2 मिनट पठन

मंदिर में पिंडदान करने का क्या विधान है?

संक्षिप्त उत्तर

पिंडदान: सामान्य मंदिर = अनुशंसित नहीं। विशिष्ट तीर्थ: गया विष्णुपद (सर्वोच्च), प्रयाग, काशी, रामेश्वरम। पिंड: चावल/जौ+तिल+शहद+घी। विधि: तर्पण (दक्षिण मुख) → पिंड कुश पर → मंत्र → ब्राह्मण भोजन। कब: पितृपक्ष, मृत्यु तिथि, अमावस्या। कौन: ज्येष्ठ पुत्र प्राथमिक।

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विस्तृत उत्तर

पिंडदान पितरों (मृत पूर्वजों) की तृप्ति और मुक्ति के लिए किया जाने वाला अत्यन्त महत्वपूर्ण कर्म है।

सामान्य मंदिर में पिंडदान

जैसा पूर्व बैच (1031) में बताया — सामान्य मंदिर के गर्भगृह में पिंडदान अनुशंसित नहीं। परंतु कुछ विशिष्ट तीर्थ-मंदिरों में यह शास्त्रसम्मत है।

विशिष्ट पिंडदान तीर्थ-मंदिर

1गया (बिहार) — सर्वोच्च

विष्णुपद मंदिर = पिंडदान का सर्वश्रेष्ठ स्थान। गयासुर की कथा — भगवान विष्णु ने गयासुर के शरीर पर पैर रखा, वहाँ विष्णुपद। गया में 45+ पिंडदान स्थल (वेदियाँ)।

2प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)

गंगा-यमुना-सरस्वती संगम = पिंडदान अत्यन्त शुभ।

3काशी (वाराणसी)

मणिकर्णिका घाट, पंचगंगा घाट = श्राद्ध/पिंडदान।

4रामेश्वरम

सेतुबंध — पिंडदान का दक्षिणी तीर्थ।

5. अन्य: हरिद्वार, त्र्यम्बकेश्वर (नारायण नागबलि), बद्रीनाथ

पिंडदान विधि (संक्षिप्त)

5पिंड सामग्री

  • चावल/जौ का आटा + तिल + शहद + घी + दूध = पिंड (गोले) बनाना
  • सामान्यतः 3 या 7 पिंड (पिता, दादा, परदादा + अन्य)

6तर्पण (जल अर्पण)

  • पवित्र जल + तिल + कुश (दर्भ)
  • दक्षिण दिशा मुख करके
  • सव्य → अपसव्य (यज्ञोपवीत दाएँ कन्धे पर)

7पिंड अर्पण

  • कुश (दर्भ) पर पिंड रखना
  • मंत्रों के साथ पितरों को आवाहन
  • पिंड पर तिल + जल छिड़कना

8ब्राह्मण भोजन + दक्षिणा

  • पिंडदान के बाद ब्राह्मण भोजन अनिवार्य
  • ब्राह्मण = पितरों का प्रतिनिधि

कब करें

  • पितृपक्ष (भाद्रपद कृष्ण — 15 दिन) — सर्वोत्तम
  • मृत्यु तिथि (वार्षिक श्राद्ध)
  • अमावस्या
  • ग्रहण काल

कौन करे

  • ज्येष्ठ पुत्र (प्राथमिक)
  • पुत्र न हो — पुत्री का पति, भतीजा, या कोई भी परिजन

गरुड पुराण

गयायां पिंडदानेन पितॄणां मुक्तिरुत्तमा।' — गया में पिंडदान से पितरों को उत्तम मुक्ति।
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शास्त्रीय स्रोत
गरुड पुराण, वायुपुराण, मत्स्यपुराण, श्राद्ध विधि, गया माहात्म्य
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