विस्तृत उत्तर
नैमित्तिक प्रलय में भगवान अनन्त या संकर्षण के मुख से संवर्तक अग्नि उत्पन्न होती है। यह अग्नि अधोलोकों को भस्म करते हुए ऊपर उठती है और भूलोक, भुवर्लोक तथा स्वर्लोक को पूरी तरह जला देती है। इसका असहनीय ताप महर्लोक तक पहुँचता है, इसलिए महर्लोक के देवता, प्रजापति, ऋषि और मुनि जनलोक की ओर चले जाते हैं। जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक इस प्रलय से पूर्णतः अछूते और सुरक्षित रहते हैं। प्रलयकालीन जल भू, भुवर् और स्वर् लोकों को डुबो देता है और सप्तर्षि मंडल तक पहुँचकर रुक जाता है। ब्रह्मा की रात के दौरान जनलोक के सिद्ध निवासी भगवान विष्णु के योगनिद्रा स्वरूप का ध्यान और स्तुति करते रहते हैं। जब नया कल्प शुरू होता है, तब जनलोक में शरण लिए हुए ऋषि और प्रजापति नीचे आकर नई सृष्टि के निर्माण और विस्तार में ब्रह्मा जी की सहायता करते हैं।
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