विस्तृत उत्तर
सत्यलोक और वैकुण्ठ में मूलभूत और अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर है। सत्यलोक भौतिक ब्रह्माण्ड के भीतर का सर्वोच्च लोक है। यद्यपि यह अत्यंत पवित्र और सात्विक है तथापि यह शाश्वत नहीं है — महाप्रलय में यह भी नष्ट होता है। यहाँ के निवासी भी अंततः क्रम मुक्ति से गुजरते हैं। इसके विपरीत वैकुण्ठ सत्यलोक से दो करोड़ बासठ लाख योजन ऊपर स्थित सनातन आध्यात्मिक जगत है जो प्रलय की अग्नि से सर्वथा मुक्त और शाश्वत है। भागवत पुराण में शुकदेव गोस्वामी (२.५.३९) इस बात का स्पष्ट विभेदन करते हैं कि ब्रह्मलोक शब्द का प्रयोग कभी-कभी सत्यलोक के लिए और कभी शाश्वत वैकुण्ठ के लिए किया जाता है। श्रील जीव गोस्वामी ने स्पष्ट किया कि 'ब्रह्मलोकः सनातनः' का तात्पर्य उस सनातन वैकुण्ठ से है।
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