विस्तृत उत्तर
शिवलिंग पर अभिषेक के बाद शिवलिंग से बहकर जलहरी (जलाधारी/योनि पीठ) से निकलने वाला जल अत्यंत पवित्र होता है। इसे 'शिव जल' या 'चरणामृत' कहते हैं।
शिव जल का उपयोग
- 1स्वयं ग्रहण करें: अभिषेक जल को शिव चरणामृत मानकर स्वयं पी सकते हैं। यह अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी है।
- 1परिवार को दें: परिवार के सदस्यों को प्रसाद के रूप में दे सकते हैं।
- 1भक्तों में बाँटें: मंदिर में अन्य भक्तों को वितरित कर सकते हैं।
- 1तुलसी/पौधों में डालें: शिव जल को तुलसी या अन्य पवित्र पौधों में डाल सकते हैं।
- 1घर में छिड़कें: घर के कोनों में छिड़कने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
किसे न दें / क्या न करें
- ▸अपवित्र स्थान (शौचालय, नाली) में न बहाएँ।
- ▸पैरों से न छुएँ, न लाँघें।
- ▸जलहरी से निकलने वाला जल शिवलिंग के उत्तर दिशा से बहता है — इसे लाँघना वर्जित है।
महत्वपूर्ण नियम: शिवलिंग की जलहरी (जलाधारी) का मुख जिस दिशा में हो, उस दिशा से शिवलिंग की परिक्रमा नहीं करनी चाहिए। अर्धचन्द्राकार (चन्द्रकार) परिक्रमा करें — जलहरी के एक ओर से जाएँ, दूसरी ओर से लौटें।
विशेष: दूध, दही, शहद आदि से अभिषेक के बाद बचा जल प्रसाद के रूप में ग्रहण करने योग्य है। किन्तु यदि भस्म, धतूरा आदि भी मिश्रित हो तो सेवन न करें — केवल तुलसी/पौधों में डालें।





