विस्तृत उत्तर
श्राद्ध = सनातन धर्मशास्त्रों, वेदों, पुराणों और स्मृतियों में मानव जीवन के सबसे अनिवार्य और पवित्र अनुष्ठानों में सर्वोच्च स्थान वाला कर्म।
### व्युत्पत्ति:
'श्रद्धया दीयते यस्मात् तत् श्राद्धम्' — अर्थात् पितरों के निमित्त जो भी अन्न, जल, पिण्ड अथवा तर्पण पूर्ण श्रद्धा और आस्तिकता के साथ अर्पित किया जाता है, वह श्राद्ध कहलाता है।
### महर्षियों का विधान:
- ▸महर्षियों और धर्मशास्त्रकारों ने मनुष्य के लिए त्रिविध ऋणों से उऋण होने का कठोर विधान निर्धारित किया है:
- ▸देव ऋण
- ▸ऋषि ऋण
- ▸पितृ ऋण
- ▸इनमें से 'पितृ ऋण' से मुक्ति का एकमात्र शास्त्र-सम्मत मार्ग = श्राद्ध कर्म।
### मूल भावना:
श्राद्ध केवल कर्मकाण्ड नहीं — यह श्रद्धा और स्मरण का अनुष्ठान है, जिसके माध्यम से वंशज अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं और उनकी पारलौकिक तृप्ति का कारण बनते हैं।
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