विस्तृत उत्तर
न्यास = 'स्थापना' — शरीर के विभिन्न अंगों में देवता/मंत्र शक्ति की स्थापना।
उद्देश्य
- 1शरीर = मंदिर बनाना: न्यास द्वारा साधक का शरीर देवता का मंदिर बन जाता है — 'देहो देवालयः प्रोक्तः' (शरीर = देवालय)।
- 2देवता से तादात्म्य: 'कृतेनयेन देवस्य सारुप्यं याति मानवः' — न्यास से मनुष्य देवता का रूप प्राप्त करता है।
- 3शरीर शुद्धि: विभिन्न अंगों की ऊर्जा शुद्ध और सक्रिय।
- 4सुरक्षा कवच: न्यास = कवच — नकारात्मक शक्तियों से रक्षा।
- 5एकाग्रता: प्रत्येक अंग पर मंत्र + स्पर्श = मन शरीर में स्थिर।
प्रमुख न्यास: ऋष्यादि, करन्यास, हृदयादि (षडंग), मातृका, व्यापक, षोढा — कुल 16+ प्रकार।
विस्तृत ऋष्यादि न्यास पिछली एंट्री (Q642) में दिया गया है।

